Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 1:1 रोमियों 1:2 रोमियों 1:3 रोमियों 1:4 रोमियों 1:5 रोमियों 1:6 रोमियों 1:7 रोमियों 1:8 रोमियों 1:9 रोमियों 1:10 रोमियों 1:11 रोमियों 1:12 रोमियों 1:13 रोमियों 1:14 रोमियों 1:15 रोमियों 1:16 रोमियों 1:17 रोमियों 1:18 रोमियों 1:19 रोमियों 1:20 रोमियों 1:21 रोमियों 1:22 रोमियों 1:23 रोमियों 1:24 रोमियों 1:25 रोमियों 1:26 रोमियों 1:27 रोमियों 1:28 रोमियों 1:29 रोमियों 1:30 रोमियों 1:31 रोमियों 1:32



रोमियों 1:13 — पाठ का तत्काल परिचय और संदर्भ
पाठ का केंद्र रोम परियोजनात्मक चर्चा के क्रम में है कि प्रेरित पौलुस वर्षों से ईश्वर के नए समर्पित प्रबोधन के बारे में स्पष्टता और विस्तार चाहता था। यहाँ उसे रोम के विश्वासियों के बीच अपनी योजना की गहराई समझाने का प्रयत्न है: वह युवाओं के लिए प्रेरित होने के अवसर और अन्यजातियों के साथ फल की भागीदारी चाहते थे, ताकि ईश्वर की योजना वैश्विक रूप से पूर्ण हो सके। यह दृष्टी रोमियों के पहले अध्याय से आगे बढ़ते हुए पौलुस के उत्साह और तड़प के साथ जुड़ती है कि कैसे विश्वास से जीना और प्रचारित करना एक साथ चले।
क्या यह वचन हमें बताता है?
यह वचन यह बताता है कि पौलुस के दिल में अन्यजातियों के बीच विश्वास का फैलाव एक निष्कामलाक्षण योजना थी, न कि केवल व्यक्तिगत प्रेरणा। वह चाहते थे कि ज्यों-ज्यों उन्होंने स्वयं में फल पाया, वैसा ही रोमी विश्वासियों के पास भी हो—ईश्वर-आशिष और आत्म-आशीर्वाद के द्वारा चर्च का एकीकृत प्रगति संभव हो। साथ ही, वाक्य में एक प्रत्याय और धैर्य की आवश्यकता है—“परन्तु अब तक रुका रहा”—यह दिखाता है कि योजना पूरी करने के लिए समय-समय पर अवरोध आए, पर ईश्वर की पथप्रदर्शक योजना स्थिर है।
ईश्वर, विश्वास और संकल्प कीछवि
परमेश्वर की कार्य-योजनाएं समय और परिस्थिति से परे रहती हैं। यहाँ ईश्वर के स्निग्ध प्रेम और विश्व-आस्था की दिशा स्पष्ट होती है: विश्वास के साथ चलना और साझा करना, ताकि सभी जातियाँ प्रभु के उद्धार के अनुभव में एक साथ हों। यह उद्धार का मिशन, न कि केवल स्थानीय समुदाय की सफलता, को प्राथमिक मानता है।
महत्वपूर्ण शब्द और चित्र
Related Cross-References
1) रोम 15:24 — प्रेरित पौलुस रोम से जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं और बताते हैं कि कैसे अन्य जगहों के विश्वासियों के साथ शारीरिक और आत्मिक संपर्क को बढ़ाने की योजना है।
2) याकूब 1:4 — धैर्य की कसौटी पर विश्वास को टिकाने के बारे में, ताकि स्थिर और पूर्ण जीवन मिले।
3) 1 कोरिन्थ 3:6-9 — विश्वास के परिणामस्वरूप परमेश्वर के काम में सहभागी बनना और हर संदिग्ध के बीच प्रभु की कृपा का भागीदारी।
आज के लिए अनुप्रयोग
हमारे लिए यह पाठ स्मरण कराता है कि ईश्वर का मिशन विश्वव्यापी है और हमें भी अपने क्षेत्र में फल-वृद्धि के लिए सहभागी बनना चाहिए। कैसे? - व्यक्तिगत जीवन में सत्य-प्रचार और नम्रता से ईश्वरीय प्रेम को जीना; - कलीसिया के भीतर और बाहर, सभी जातियों के बीच समान अवसर और सहायता देना; - बाधाओं के बावजूद विश्वास की दिशा न छोड़ना, और धैर्य से योजना के समय को स्वीकारना।
मैथ्यू हेनरी, एलबर्ट बर्न्स आदि के संक्षिप्त उद्धरण
यदि आवश्यक हो तो नीचे संक्षिप्त रूप में आधुनिक पाठ के साथ सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के मूल्यवान निष्कर्ष जोड़े जाते हैं:
मैथ्यू हेनरी: “पौलुस की यह इच्छा दिखाती है कि ईश्वर की आशीष बहुधा बाधाओं के पार जाकर अनुभव होती है; विश्वास के साथ प्रयत्न एक व्यापक उद्धार-कार्य का अंग है।”
एल्बर्ट बार्न्स: “वह रोमी विश्वासियों के साथ एक साझेदारी के मूड में है, ताकि ईश्वर की योजना विश्व-स्तर पर क्रिया करे।”
एडम क्लार्क: “यह वचन स्पष्ट करता है कि प्रेरित का हृदय अन्यजातियों के लिए उद्धार के संदेश का उत्साहपूर्वक प्रचारक है, और वह इसे पूर्ण करने हेतु अभी-भी प्रयासरत है।”
कथन के अंत में संक्षेप
पौलुस का मन यह बताता है कि ईश्वर का उद्धार-कार्य एक गतिशील, बहुमुखी मिशन है; हमारा कर्तव्य है कि हम अपने जीवनों को उसी के अनुरूप ढालें और विश्वास के फल से समुदायों में एकता और जीवंतता को बढ़ाएं।