Old Testament
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प्रेरितों के काम 20:1 प्रेरितों के काम 20:2 प्रेरितों के काम 20:3 प्रेरितों के काम 20:4 प्रेरितों के काम 20:5 प्रेरितों के काम 20:6 प्रेरितों के काम 20:7 प्रेरितों के काम 20:8 प्रेरितों के काम 20:9 प्रेरितों के काम 20:10 प्रेरितों के काम 20:11 प्रेरितों के काम 20:12 प्रेरितों के काम 20:13 प्रेरितों के काम 20:14 प्रेरितों के काम 20:15 प्रेरितों के काम 20:16 प्रेरितों के काम 20:17 प्रेरितों के काम 20:18 प्रेरितों के काम 20:19 प्रेरितों के काम 20:20 प्रेरितों के काम 20:21 प्रेरितों के काम 20:22 प्रेरितों के काम 20:23 प्रेरितों के काम 20:24 प्रेरितों के काम 20:25 प्रेरितों के काम 20:26 प्रेरितों के काम 20:27 प्रेरितों के काम 20:28 प्रेरितों के काम 20:29 प्रेरितों के काम 20:30 प्रेरितों के काम 20:31 प्रेरितों के काम 20:32 प्रेरितों के काम 20:33 प्रेरितों के काम 20:34 प्रेरितों के काम 20:35 प्रेरितों के काम 20:36 प्रेरितों के काम 20:37 प्रेरितों के काम 20:38



प्रेरितों के काम 20:35 — रीति से परिश्रम करते हुए निर्बलों को सम्भालना
यह श्लोक प्रेरितों के काम के एक शिक्षाप्रद अंतरे का हिस्सा है, जिसमें पौलुस अपने विश्वासियों से अपने जीवन के नमूने के रूप में सेवा-परिश्रम और उदारता का पाठ दे रहे हैं। उन्होंने अपने समर्थनों के पास जाकर नहीं, बल्कि प्रभु यीशु के शब्दों को स्मरण कर यह कहा कि “लेने से देना धन्य है।” यह संदेश उनके मिशनरी प्रवास के दौरान दर्शकों के लिए एक मार्गदर्शक बन जाता है: आत्म-त्याग और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति दया-प्रसंग का समन्वय।
ईश्वर और विश्वास के बारे में जो पाठ दिखाता है
यह verse हमें यह सिखाता है कि सांसारिक लाभ के बजाय आस्था और प्रेम की क्रिया क्रियाशील होती है। प्रभु यीशु के शब्दों का स्मरण कर के शिष्य यह समझते हैं कि देना एक आशीष है, क्योंकि यह ईश्वर की आत्मा के कार्य की प्रतिध्वनि है—जो निर्बलों की सहायता में प्रकट होता है। अपने प्रेरितों के जीवन में यह रीति प्रभुजी की सीखों के अनुरूप है: हृदय की उदारता, श्रम और निर्बलों की देखरेख एक ही ईश्वरीय फोलोअरशिप का भाग है।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्टता
- “परिश्रम करते हुए”: यहां प्रकाशित कार्यकार्य के लिए निरंतर मेहनत और जिम्मेदारी का संकेत है—खासकर निर्बलों के लिए सेवा के संदर्भ में।
- “निर्बलों को सम्भालना”: कमजोर, असहाय जनों के प्रति कृपा-प्रभाव, सहायता और सामाजिक सुरक्षा का काम।
- “लेने से देना धन्य है”: यीशु के आशीर्वचन का सार—दान-प्राप्ति के चक्र में हिस्सा लेना वास्तविक आशीर्वाद है; स्वयं के लाभ से ऊपर समुदाय के लाभ को महत्व देना।
संबद्ध पाठ
संलग्न पाठ्य में तीन प्रमुख cross-references स्वतः जुड़ते हैं:
इनका संक्षिप्त संबंध यह है कि विश्वास का जीवंत होना कार्यों से परखा जाता है; निर्बलों की सहायता और उदारता इस आधारशिला में आते हैं कि আঁहाहারে ईश्वर की करुणा हमारे भीतर प्रवाहित हो।
आज के परमार्थी जीवन में अनुप्रयोग
- अपने संसाधनों का एक भाग निर्बलों के लिए सुरक्षित रखें—यही वास्तविक सामुदायिक आपसी सहायता है।
- अपने दैनिक जीवन में परिश्रम को ऐसी सेवा-व्यवस्था बनाएं जिसमें आप जरूरतमंदों की सहायता करते हों, चाहे वे परिचित हों या अजनबी।
- स्मरण रखें कि दान देना केवल धन से नहीं हो सकता; समय, योग्यता और ईश्वर की सेवा के अवसर भी दान माने जाते हैं।
उच्चतम सार
इस श्लोक में प्रेरितों के जीवन-चरित्र का एक ठोस नमूना मिलता है: परिश्रम, समाज के कमजोर वर्गों के लिए संरचना, और प्रभु यीशु के शब्दों को जीवन में उतारना। एक प्रामाणिक ईश्वर-आस्था वही है जो देन के साथ जीना सिखाती है, ताकि प्रभु के वचनों की पूर्ति हो और गिरह-जाति में भी उनका प्रकाश बचे।
ध्यान दें: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के मूल टिप्पणी-टुकड़े अगर उपलब्ध हों, तो छोटे उद्धरण नीचे दिए जा सकते हैं—परन्तु पूर्ण पाठ नहीं।