Old Testament
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आमोस 9:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
सेनाओं के परमेश्वर यहोवा के स्पर्श करने से पृथ्वी पिघलती है, और उसके सारे रहनेवाले विलाप करते हैं; और वह सब की सब मिस्र की नदी के समान हो जाती हैं, जो बढ़ती है फिर लहरें मारती, और घट जाती है।
आमोस 9:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
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आमोस 9:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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आमोस 8:8 (HINIRV) »
क्या इस कारण भूमि न काँपेगी? क्या उन पर के सब रहनेवाले विलाप न करेंगे? यह देश सब का सब मिस्र की नील नदी के समान होगा, जो बढ़ती है, फिर लहरें मारती, और घट जाती है।”

भजन संहिता 46:6 (HINIRV) »
जाति-जाति के लोग झल्ला उठे, राज्य-राज्य के लोग डगमगाने लगे; वह बोल उठा, और पृथ्वी पिघल गई। (प्रका. 11:18, भज. 2:1)

आमोस 9:5 पर केंद्रित टिप्पणी
मुख्य interpretive बिंदु: यह वचन परमेश्वर की सर्वोच्च नियंत्रण क्षमता और न्यायपूर्ण क्रिया का उद्घोष है— परमेश्वर के स्पर्श से पृथ्वी का पिघलना और सत्ता के ऊपर मानव-युग की अस्थिरता का प्रकटन; यह संकेत देता है कि अंततः दुष्टि, असहाय दर्द, और प्रत्याशित न्याय एक ही क्रम में घटित होते हैं, भले मनुष्यों के रूप में हमारे अनुभव कितने भयावह क्यों न हों।
साहित्यिक संदर्भ (पाठ्य-प्रसंग)
आमोस की किताब के इस हिस्से में परमेश्वर के राजस्व-नियमन की व्यापक तस्वीर दी गई है। पूर्व के भागों में आर्य-चेतावनियाँ और न्याय के संकेत आता है; अंत में आशातीत न्याय का दृढ़ संदेश मिलता है। यहाँ “सेनाओं के परमेश्वर” के स्पर्श से भूमि की शॉथिक प्रतिक्रिया, और मिस्र-सी नदी-प्रतीक के साथ चर्चा एक क्रमिक चेतावनी बनाती है: परमेश्वर की महिमा और न्याय दोनों एक ही क्रिया-धर्मी क्रिया से घटित होते हैं।
धार्मिक-तत्विक महत्व
यहाँ प्रभु के स्पर्श से पृथ्वीतल की पिघलन एक चिह्न है कि प्रभु सत्ता में हैं और उनकी उपस्थिति उत्पात या सुरक्षा नहीं, बल्कि परिवर्तन और परीक्षण ला सकती है। यह न टूटती दीवारों के नहीं, बल्कि हर प्रकार के प्रतिरोध के विरुद्ध राज्य-नियंत्रण और न्याय का संकेत है। साथ ही मिस्र की नदी-सी दृढ़ता का टूटना बताता है कि प्रतीत होने वाले स्थायित्व के पीछे भी परमेश्वर की योजना है।
पवित्र शास्त्रों के साथ जोड़
इन संदर्भों से गहराई से समझ आता है कि प्रकृति-यथार्थता और मृत्यु-मरण नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार परिवर्तन का क्रम चलते हैं।
आलौकिक–आस्था के लिये प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
आमोस 9:5 में परमेश्वर का स्पर्श बनाम पृथ्वी का पिघलना एक वायदा-ध्वनि है जो बताती है कि प्रभु का न्याय और उनके राज्य की स्थापना एक साथ चलते हैं। भय से नहीं, बल्कि विश्वास और पवित्रता के आरोहण से हमें खड़े रहना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर का उद्देश्य शांति और पुनर्निर्माण है—भले ही उसमें कटु परीक्षा भी हो।
cross-references
यशाय 64:1— प्रभु के डर से प्रकृति का उफान आपस में जुड़ जाता है; यह देखने का संकेत कि ईश्वर की उपस्थिति परिवर्तन-क्रिया लाती है।
यहोशू 6— परमेश्वर के निर्णय से मजबूत प्रतिरोध कैसे ढहते हैं, और कैसे विश्वासियों को धैर्य से आगे बढ़ना चाहिए।
याकोब 1:2-4— trials द्वारा आत्म-साक्षात्कार और दृढ़ता की परिपक्वता।
टिप्पणीयोग्य उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke): यदि उपलब्ध हों, वे पाठ के साथ छूटकर उद्धृत हो सकते हैं; यहाँ संकलन में मुख्यतः सार-संयोजन प्रकाशित किया गया है।