Old Testament
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निर्गमन 1 निर्गमन 2 निर्गमन 3 निर्गमन 4 निर्गमन 5 निर्गमन 6 निर्गमन 7 निर्गमन 8 निर्गमन 9 निर्गमन 10 निर्गमन 11 निर्गमन 12 निर्गमन 13 निर्गमन 14 निर्गमन 15 निर्गमन 16 निर्गमन 17 निर्गमन 18 निर्गमन 19 निर्गमन 20 निर्गमन 21 निर्गमन 22 निर्गमन 23 निर्गमन 24 निर्गमन 25 निर्गमन 26 निर्गमन 27 निर्गमन 28 निर्गमन 29 निर्गमन 30 निर्गमन 31 निर्गमन 32 निर्गमन 33 निर्गमन 34 निर्गमन 35 निर्गमन 36 निर्गमन 37 निर्गमन 38 निर्गमन 39 निर्गमन 40Verse
निर्गमन 30:1 निर्गमन 30:2 निर्गमन 30:3 निर्गमन 30:4 निर्गमन 30:5 निर्गमन 30:6 निर्गमन 30:7 निर्गमन 30:8 निर्गमन 30:9 निर्गमन 30:10 निर्गमन 30:11 निर्गमन 30:12 निर्गमन 30:13 निर्गमन 30:14 निर्गमन 30:15 निर्गमन 30:16 निर्गमन 30:17 निर्गमन 30:18 निर्गमन 30:19 निर्गमन 30:20 निर्गमन 30:21 निर्गमन 30:22 निर्गमन 30:23 निर्गमन 30:24 निर्गमन 30:25 निर्गमन 30:26 निर्गमन 30:27 निर्गमन 30:28 निर्गमन 30:29 निर्गमन 30:30 निर्गमन 30:31 निर्गमन 30:32 निर्गमन 30:33 निर्गमन 30:34 निर्गमन 30:35 निर्गमन 30:36 निर्गमन 30:37 निर्गमन 30:38
निर्गमन 30:17—Overview
इस पवित्र वचन में परमप्रधान यहोवा मूसा से बतलाते हैं कि यरूबेल की संतति के लिए विशेष पवित्र जल से अभिषेक और पवित्रता का उपाय किया जाएगा। यह वचन एक धार्मिक जीवन के भीतर की शुद्धता और परमेश्वर के सामने रहने की अधिकारिता की याद दिलाता है। यहूदियों के धार्मिक कर्मकांड में जल का महत्व, पवित्रता की आवश्यकता और ईश्वर की इच्छा के अनुसार पूजा करने की आस्था को दर्शाता है।
पद का स्थान और संदर्भ
यह verses परमेश्वर के पवित्र जल से अभिषेक करने की व्यवस्था का हिस्सा है, जो मूसा को परमेश्वर के मंदिरीय क्रियाओं के लिए निर्देशित करते हैं। यह अतःपवित्र कर्म के लिए विशिष्ट जल-उपचार का संकेत है, ताकि सर्वभौम ईश्वर के सामने असुरक्षित और पवित्र निर्मलीकरण हो सके।
सेक्शन: Verse के भीतर मुख्य पाठ
“और यहोवा ने मूसा से कहा,” यह शाब्दिक उद्घोष नहीं केवल आदेश है, बल्कि एक सजीव संवाद का आरम्भ है। परमेश्वर की स्थापना, उसकी व्यवस्था और मनुष्य की स्वच्छता के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शक नियम यहां प्रकट होता है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
मुख्य शिक्षा यह है कि पवित्रता परमेश्वर के निकटता का पहला पहरावा है। ईश्वर अपने लोगों के बीच रहने के लिए एक विशिष्ट पवित्रता-यात्रा चाहते हैं; जल-उपचार जैसे कर्म यह दर्शाते हैं कि भोगौलिक जीवन से ऊपर उठकर, ईश्वर के साथ सीधा संबंध जोड़ा जाए। यह भी संकेत देता है कि सेवा-कार्य में भी आचरण और शुद्धता आवश्यक है ताकि परमेश्वर की उपस्थिति अभिषेक के बाद बनी रहे।
अनुभविक-आध्यात्मिक पाठ (Cross-references)
इन सभी उद्धरणों में एक ही धुन है: ईश्वर के निकट रहने के लिए आचरण, शुद्धता और पवित्रता चाहिए; आचरण में क्रमबद्धता और मन में ईश्वर का भय आवश्यक है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
संक्षेप
निर्गमन 30:17 ईश्वर के पवित्र और सात्विक जीवन के लिए एक स्पष्ट स्मारक है। यह बताता है कि परमेश्वर के निकट रहने के लिए मन-पर और कर्म-पर शुद्धता अनिवार्य है। यहाया गया जल-उपचार और अभिषेक का संकेत, तात्कालिक नहीं बल्कि जीवन-भर की आराधना और सेवाभाव की दिशा देता है।
कथा-सार और अध्याय में स्थान
इस अध्याय का संदेश यह है कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था के अनुसार पवित्रता और शुद्धता को महत्व देते हैं, ताकि उनके लोग उनके सम्मुख सही रीति से आ सकें। यह और स्पष्ट करता है कि धार्मिक संस्कार केवल कर्म-क्रिया नहीं, बल्कि एक आंतरिक परिवर्तन और ईश्वर के साथ घनिष्ठ संबंध की मांग है।
नोट: मैथ्यू हेनरी, अॉल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के संक्षिप्त उद्धरण यहाँ न्यूनतम रूप में शामिल किए गए हैं: “पवित्रता भीतर से प्रकट होती है; जो व्यवहार में दिखे वही असली श्रद्धा है।” (सारांशित विचार)