Old Testament
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एज्रा 1:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
“फारस का राजा कुस्रू यह कहता है: स्वर्ग के परमेश्वर यहोवा ने पृथ्वी भर का राज्य मुझे दिया है, और उसने मुझे आज्ञा दी, कि यहूदा के यरूशलेम में मेरा एक भवन बनवा*।
एज्रा 1:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
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एज्रा 1:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 45:12 (HINIRV) »
मैं ही ने पृथ्वी को बनाया और उसके ऊपर मनुष्यों को सृजा है; मैंने अपने ही हाथों से आकाश को ताना और उसके सारे गणों को आज्ञा दी है।

यशायाह 44:26 (HINIRV) »
और अपने दास के वचन को पूरा करता और अपने दूतों की युक्ति को सफल करता हूँ; जो यरूशलेम के विषय कहता है, 'वह फिर बसाई जाएगी' और यहूदा के नगरों के विषय, 'वे फिर बनाए जाएँगे और मैं उनके खण्डहरों को सुधारूँगा,'

दानिय्येल 5:23 (HINIRV) »
वरन् तूने स्वर्ग के प्रभु के विरुद्ध सिर उठाकर उसके भवन के पात्र मँगवाकर अपने सामने रखवा लिए, और अपने प्रधानों और रानियों और रखेलों समेत तूने उनमें दाखमधु पिया; और चाँदी-सोने, पीतल, लोहे, काठ और पत्थर के देवता, जो न देखते न सुनते, न कुछ जानते हैं, उनकी तो स्तुति की, परन्तु परमेश्वर, जिसके हाथ में तेरा प्राण है, और जिसके वश में तेरा सब चलना-फिरना है, उसका सम्मान तूने नहीं किया। (अय्यू. 12:10, भज. 115:4-8)
एज़्रा 1:2 का संदेश और उसका संदर्भ
मुख्य बिंदु: परमेश्वर के वचन के अनुसार सत्ता-पद पाने के बावजूद इतिहास-गठबंधन और उद्धार-योजना में विवेकपूर्ण विनम्रता आवश्यक है। फारस के राजा कुश्रू के संदेश को यहोवा की योजना के साथ जोड़ना हमें बताता है कि सामर्थ्य और सत्ता परमेश्वर के नियंत्रण में है, और यहूदियों के लौटना तथा दूसरा मंदिर निर्माण उसकी योजना का एक भाग है।
साहित्यिक संदर्भ (literary context)
एज़्रा 1 अध्याय में पुराने गौरवपूर्ण समय से लौटते लोगों के सांस्कृतिक-धार्मिक पुनर्गठन का आरंभ होता है। कुश्रू का संदेश प्रकट करता है कि विदेशी सत्ता ने भी यहोवा के उद्देश्य को पूरा करने में एक औजार के रूप में काम किया है। यह परिप्रेक्ष्य इतिहास-धर्मशास्त्र के भीतर “कर्म-योजना” और “धर्म-उद्धार” के बीच संतुलन दिखाता है।
धर्मशास्त्रीय महत्व
1:2 में राजा कुश्रू का उद्घोष, “मैंने यह आदेश दिया है…” हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर अपने उद्देश्य को सत्ता-स्तर पर भी संचालित करता है। यह उद्धार-योजना में मानव-योजनाओं और विश्व-राज्य के मिश्रण को दिखाता है—यही वह विषय है जिसे भविष्य में रीकॉन्टिंग और मंदिर-निर्माण के रूप में स्पष्ट किया गया।
यह मानव इतिहास में एक प्रशंशा-योग्य सत्य है: जब साधारण मानव अपने राजनीतिक निर्णयों को करता है, तब भी प्रभु का उद्देश्य चलता रहता है। इसलिए यहोदियों के लौटना और मंदिर-निर्माण एक विश्व-आयाम में हुआ, न कि एक निजी-दायरे में।
पवित्रशास्त्रीय संबंध (Cross-references)
व्याख्या-नोट: इन संदर्भों में मूर्त चेतना यह है कि परमेश्वर के उद्देश्य के अनुरूप सत्ता-चक्र और मानव-योजनाएं कैसे एक साथ चलती हैं, ताकि पुर्नस्थापना और श्रद्धा-बद्ध जीवन संभव हो सके।
विचार-विमर्श के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
एज़्रा 1ः2 से स्पष्ट होता है कि सत्ता और परमेश्वर-योजना के बीच संतुलन बना रहना चर्चित उद्धार-योजना का अभिन्न भाग है। कुश्रू का उद्घोष यह संकेत देता है कि बाहरी सत्ता के फैसले भी परमेश्वर की अनुमति से संचालित होते हैं, ताकि यहूदी लौटकर मंदिर-निर्माण कर सकें। यह पाठ विश्वास-धर्म और इतिहास-योजना के मिलन की गूंज है—एक ऐसी गवाही जिसमें प्रभु के उद्देश्य हर समय आगे बढ़ते हैं।
[उद्धरण: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सीधे उद्धरण उपलब्ध होने पर ही बताए जाएंगे; फिलहाल इन विचारों के साथ सम्बन्धित संकल्पनात्मक सार प्रस्तुत है]