Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
उत्पत्ति 1 उत्पत्ति 2 उत्पत्ति 3 उत्पत्ति 4 उत्पत्ति 5 उत्पत्ति 6 उत्पत्ति 7 उत्पत्ति 8 उत्पत्ति 9 उत्पत्ति 10 उत्पत्ति 11 उत्पत्ति 12 उत्पत्ति 13 उत्पत्ति 14 उत्पत्ति 15 उत्पत्ति 16 उत्पत्ति 17 उत्पत्ति 18 उत्पत्ति 19 उत्पत्ति 20 उत्पत्ति 21 उत्पत्ति 22 उत्पत्ति 23 उत्पत्ति 24 उत्पत्ति 25 उत्पत्ति 26 उत्पत्ति 27 उत्पत्ति 28 उत्पत्ति 29 उत्पत्ति 30 उत्पत्ति 31 उत्पत्ति 32 उत्पत्ति 33 उत्पत्ति 34 उत्पत्ति 35 उत्पत्ति 36 उत्पत्ति 37 उत्पत्ति 38 उत्पत्ति 39 उत्पत्ति 40 उत्पत्ति 41 उत्पत्ति 42 उत्पत्ति 43 उत्पत्ति 44 उत्पत्ति 45 उत्पत्ति 46 उत्पत्ति 47 उत्पत्ति 48 उत्पत्ति 49 उत्पत्ति 50Verse
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उत्पत्ति 2:13 का संदर्भ और संदर्भ-आख्यान
पद कर्मकथा के अनुसार यह वाक्य Eden के जल-नदी के विस्तार के दृश्य को स्पष्ट करता है। पहली नदी पिशोन, दूसरी नदी गीहोन के नाम से जानी जाती है। यहाँ गीहोन कोकूश देश को घेरने वाला क्षेत्र माना गया है, जो उस समय के भूगोल और सरकार की रचना में नदियों के स्थान-निर्देशन का संकेत देता है।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से सीख
यह पाठ हमें बताता है कि परमेश्वर ने यह संसार एक व्यवस्थित व्यवस्था के साथ बनया है, जिसमें जल-मार्ग भी मार्गदर्शक भूमिका निभाते हैं। नदीयों के नाम और उनके क्षेत्र-लक्षण—ज्यों “गीहोन” का क्षेत्र-घेरे जाना—यह दिखाता है कि परमेश्वर की योजना में पृथ्वी के भौतिक पहलुओं के साथ उसका नियंत्रण और संरक्षण है। बाइबल का यह भाग हमारी सुरक्षा का विश्वास बढ़ाता है कि प्राणी के हर भाग में परमेश्वर की योजना मौजूद है, न केवल आध्यात्मिकता में बल्कि भौगोलिक-स्तर पर भी।
शब्दों और चित्रों की व्याख्या
गीहोन—यह नाम एक विशाल क्षेत्र का संकेत देता है जो पूरब से पश्चिम तक फैला रहा है; इसे “कूश के सारे देश” को घेरे हुए कहा गया है। यह चित्रण बताता है कि विश्व के विविध भाग परमेश्वर की अपरिहार्य सत्ता के भीतर आते हैं। ऐसे भिन्न-भिन्न भू-भाग परमेश्वर के उत्तरदायित्व और नियंत्रण की प्रमाणक हैं, न कि लोक-एहमत या डर के कारण।
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आज के संदर्भ में आवेदन
हम देखते हैं कि विश्व-भूभाग में जो भी क्षेत्र हैं, वे ईश्वर के नियन्त्रण के अधीन हैं। हमारे दैनिक जीवन में भी यही सत्य लागू होता है: चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विस्तृत या जटिल हों, प्रभु की योजना का भाग बनने के लिए विश्वास बनाए रखना आवश्यक है। कठिन भागों में भी ईश्वर की शांति और व्यवस्था पर भरोसा करें।
सार-संयोजन
गीत-यात्रा के इस छोटे छोटे क्षण में भी यह संकेत मिलता है कि परमेश्वर के सृजन-निर्देशन में पृथ्वी-जल से लेकर भू-भाग तक सब कुछ एक समन्वय में है। यह विश्वास हमारी दैनिक नैतिक-आचार, आशा और परवाह में मार्गदर्शक बने।
सीधे उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke): यहां दिए गए पाठ से उनके मौलिक टिप्पणी-उद्धृत भाग उपलब्ध नहीं हैं; यदि आप उनके निश्चित वाक्यों की चाह रखते हैं तो मैं उद्धृत कर सकता हूँ और उनके तर्कों के अनुरूप हिंदी रूपांतर दे दूँ।