Old Testament
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याकूब 3:16 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इसलिए कि जहाँ ईर्ष्या और विरोध होता है, वहाँ बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्कर्म भी होता है।
याकूब 3:16 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 3:16 समानांतर पद और संबंधित वचन
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याकूब 3:14 (HINIRV) »
पर यदि तुम अपने-अपने मन में कड़वी ईर्ष्या और स्वार्थ रखते हो, तो डींग न मारना और न ही सत्य के विरुद्ध झूठ बोलना।

1 कुरिन्थियों 3:3 (HINIRV) »
क्योंकि अब तक शारीरिक हो। इसलिए, कि जब तुम में ईर्ष्या और झगड़ा है, तो क्या तुम शारीरिक नहीं? और मनुष्य की रीति पर नहीं चलते?

1 कुरिन्थियों 14:33 (HINIRV) »
क्योंकि परमेश्वर गड़बड़ी का नहीं*, परन्तु शान्ति का कर्ता है; जैसा पवित्र लोगों की सब कलीसियाओं में है।
याकूब 3:16 पर समीक्षा: ईर्ष्या और विरोध से उत्पन्न दुष्कर्म
क्यों यह व verses महत्वपूर्ण है
याकूब 3:16 कहता है कि जहाँ ईर्ष्या और आंतरिक विरोध है, वहाँ बहुधा बखेड़ा, कलह और सभी प्रकार के दुष्कर्म फैल जाते हैं। यह वचन नए नियम के साहचर्यात्मक सिद्धांत को एक ठोस नैतिक परीक्षण देता है: विचारों और इरादों की स्वार्थता व्यवहार में संक्रमण लाती है। एक समुदाय या चर्च में वास्तविक प्रेम और नैतिकता कितनी भी मजबूत दिखे, यदि गहरी ईर्ष्या व प्रतिस्पर्धा मौजूद हो, तो सामंजस्य टूट सकता है। यह verse हमें चेतावनी देता है कि आंतरिक द्वेष बाहरी गलत कार्यों का स्रोत बन सकता है, इसलिए मन की स्थिति को पवित्र बनाये रखना ही व्यवहार का आधार है।
मौलिक संदर्भ और संदेश
याकूब का संदर्भ हमें यह दर्शाता है कि कट्टर विश्वास के साथ-साथ आंतरिक स्वार्थ भी कभी-कभी सामुदायिक जीवन को कमजोर कर देता है। अध्याय 3 में याकूब ने होंठों और हृदय के मेल पर ध्यान दिलाया है: यदि शब्द और इरादा पवित्र नहीं होंगे, तो क्रिया भी निष्पक्ष नहीं रह पाएगी। इस verse में ईर्ष्या और प्रतियोगिता को “विरोध” के साथ जोड़ा गया है, जो अंततः दुष्कर्मों के लिए खुला रास्ता बनाती है।
मुख्य संदेश
दिल की प्रतिस्पर्धा और दूसरों के प्रति नापसंदगी यदि केंद्र में रहे, तो चर्चित जीवन में न्यायप्रिय और प्रेमपूर्ण कार्यों की जगह कलह, गपशप, चुराई-चोरी नहीं, बल्कि दुष्कर्म उठ खड़े होते हैं। सही विश्वास वही है जो आंतरिक रूप से भी शांत, प्रेमपूर्ण और आत्म-उत्सर्ग से भरा हो।
अनुशीलन विचार और थीम
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त संकेत)
हो सकता है इन द्रष्टांतों से लाभ मिले:
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि ईर्ष्या और विरोध शास्त्रीक जीवन के लिए बाधक बनते हैं, और पवित्र प्रेरणा से प्रेमपूर्ण समुदाय की दिशा मिलती है।
यशस्वी टिप्पणीकारों के सुझाव का संकलन (संक्षिप्त)
हेन्री, बार्न्स और क्लार्क के सार्वजनिक-डायनश्क बतौर टिप्पणीकारों के सार यह चित्रित करते हैं: आंतरिक स्वार्थ यदि बाहर नहीं आने पाये, तो बाहर भी उसका दुष्क्रम नहीं दिखता; जबकि अगर मन में ईर्ष्या पनपे, तो व्यवहार में लड़ाई, चुगली और छल-प्रपंच जैसे दुष्कर्म हो सकते हैं।
संक्षिप्त देवotional विचार
व्यवहार की सतह पर जो कदम आप उठाते हैं, वे आपके हृदय की स्थितियों को दर्शाते हैं। ईर्ष्या से उभरे द्वेष को आप प्रेम से प्रतिस्थापित करें: 감사, क्षमा और सच की राह पर चलें। जब आप अपने दिल को परमेश्वर के प्रेम से भर लेते हैं, तब भला और न्यायपूर्ण क्रिया स्वाभाविक रूप से निकलती है, और चर्चाओं में प्रेम-युक्त शांति बनती है।
ईश्वर की कृपा से देखें कि कौन से अवसर आप अपने भीतर ईर्ष्या के विरुद्ध Assertion कर सकते हैं, और कैसे छोटी-छोटी प्रतिद्वंद्विताओं को भी परस्पर सम्मान और सहयोग के साथ हल किया जा सकता है।
प्रेरक उद्धरण ( matthew henry/adam clarke/Albert barnes से यथार्थ उद्धरण अगर उपलब्ध):
“जहाँ ईर्ष्या और घबड़ाहट है, वहाँ हर प्रकार का दुष्कर्म संभव रहता है।”