Old Testament
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याकूब 3:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
एक ही मुँह से स्तुति और श्राप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयों, ऐसा नहीं होना चाहिए।
याकूब 3:10 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 3:10 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 पतरस 3:9 (HINIRV) »
बुराई के बदले बुराई मत करो और न गाली के बदले गाली दो; पर इसके विपरीत आशीष ही दो: क्योंकि तुम आशीष के वारिस होने के लिये बुलाए गए हो।

1 कुरिन्थियों 3:3 (HINIRV) »
क्योंकि अब तक शारीरिक हो। इसलिए, कि जब तुम में ईर्ष्या और झगड़ा है, तो क्या तुम शारीरिक नहीं? और मनुष्य की रीति पर नहीं चलते?

याकूब 3:10 का पाठ और उसका संदेशन
याकूब 3:10 कहता है, “एक ही मुँह से स्तुति और श्राप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयों, ऐसा नहीं होना चाहिए।” यह पाठ दोहरी चेतावनी देता है: हमारे अभिवादन और आशीर्वाद, नियम और आचरण में असंगतता धार्मिक जीवन की सच्चाई को धूमिल कर देती है।
पाठ का तात्कालिक परिवेश
याकूब की चिट्ठी समुदाय के भीतर आने वाली विभेदों, गर्मी-ठंडे स्वभाव और बोली-चाल के आवेश को शांत करने के लिए है। लेखक दुष्प्रचार, ईर्ष्या, और स्वार्थपूर्ण इच्छा के कारण बने आचरणों पर अंकुश लगाते हैं। इस पद में वह यह दिखाते हैं कि tongue या जुबान की शक्ति केवल शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार और विश्वास के कार्यों तक जाती है।
पाठ से ईश्वर या विश्वास के बारे में क्या मिलता है
यहूदियों के तर्क में जुबान एक अति महत्वपूर्ण संकेतक है। यदि विश्वास सच है, तो वास्तविक जीवन में तोर-तरीकों से प्रतिफलित होता है। एक ही मुँह से परमेश्वर की महिमा और श्राप निकलना, यह दिखाता है कि बाहरी पूजा और आंतरिक परिवर्तन के बीच खाई है। सच्ची धार्मिकता वह है जो भाषण और आचरण में समन्वय रखती है। यह बात आदान-प्रदान और दूसरों के प्रति व्यवहार से प्रकट होती है।
महत्वपूर्ण शब्दों या प्रतिमाओं की स्पष्ट व्याख्या
याकूब हमें याद दिलाते हैं कि एक व्यक्ति जो परमेश्वर की सच्ची भक्ति को मानता है, उसे अपने बोली-चाल में भी शुद्धता रखनी चाहिए।
संबद्ध पाठ (cross-references) और उनका संक्षेप में तात्पर्य
आज के संदर्भ में उपयोगी अनुप्रयोग
आज के समुदाय में भी वह वास्तविकता उतनी ही प्रासंगिक है: हमारी चर्चित प्रार्थनाओं, आशीर्वाद कार्यक्रमों और व्यक्तिगत वार्ता में सामंजस्य आवश्यक है। यदि हमारा दिल परमेश्वर के प्रति भक्त है, तो हमारी भाषा भी निर्मल, सहानुभूतिपूर्ण और वैसी होनी चाहिए जैसी परमेश्वर की महिमा को प्रकट करे।
एक समेकित निष्कर्ष
याकूब 3:10 हमें यह सिखाता है कि ईमानदारी, आस्था और व्यवहार एक संयुक्त भिन्न नहीं बल्कि एक ही प्रकट होना चाहिए। यदि हम एक ही मुँह से स्तुति और श्राप बोलते हैं, तो हमारी आस्था पर संदेह उभरते हैं। संतुलित जीवन वही बन सकता है जहाँ दिल की पूजा और दैनिक बोलचाल एक दूसरे को पुष्ट करें।
उद्धरण के लिए नोट: मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के पूर्व-धारणा ग्रंथों से संक्षेपित विचार को इस पाठ के आलोक में समाहित किया गया है। नीचे उनके विचारों के छोटे उद्धरण अगर उपलब्ध हों, वही दी गई जगह पर उद्धृत हैं:
“One tongue cannot utter both praise and curse and remain sweet in the memory of God.” (सार)”