Old Testament
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याकूब 3:14 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
पर यदि तुम अपने-अपने मन में कड़वी ईर्ष्या और स्वार्थ रखते हो, तो डींग न मारना और न ही सत्य के विरुद्ध झूठ बोलना।
याकूब 3:14 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 3:14 समानांतर पद और संबंधित वचन
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याकूब 3:16 (HINIRV) »
इसलिए कि जहाँ ईर्ष्या और विरोध होता है, वहाँ बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्कर्म भी होता है।

1 कुरिन्थियों 13:4 (HINIRV) »
प्रेम धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं।

फिलिप्पियों 2:3 (HINIRV) »
स्वार्थ या मिथ्यागर्व के लिये कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।
याकूब 3:14 पर दृश्य: ईर्ष्या और स्वार्थ की चेतावनी
पद का संदर्भ याकूब के विचारों में विश्वास, भाषण और कार्यों के बीच समन्वय की मांग को स्थापित करता है। अध्याय 3 का मूल विषय है कि वाणी की शक्ति कैसे चरित्र की दिशा तय करती है। यहाँ प्रेरित याकूब चेतावनी देते हैं कि यदि मेरे मन में कड़वी ईर्ष्या और स्वार्थ है, तो वे शब्द-क्रिया से झलकते हैं—घमंड, असत्य, और बिना प्रेम के बोल-चाल। बुद्धिमानी और मसीही व्यवहार के लिए यह जरूरी है कि विचार और बोले हुए शब्द एक दूसरे से मेल खाते हों।
मुख्य अर्थ
यह वचन बताता है कि आंतरिक द्वेष या स्वार्थ अगर भीतर है, तो उसकी झलक बाहरी हरकतों में आ जाती है—परन्तु वे ईमानदारी और सत्य के विरुद्ध हो सकते हैं। प्रेरित याकूब इसका उद्देश्य यह है कि विश्वास की प्रमाणिकता वही है जो व्यवहार में स्पष्ट हो, न कि केवल बाहरी धर्म के प्रदर्शन से।
तीन प्रमुख विषय
पृष्ठभूमि से जुड़ी उद्धरणात्मक धारा
मत्ती हेनरी और ऐल्बर्ट बार्न्स के सामान्य टिप्पणियों से प्रेरणा मिलती है: वे ईर्ष्या और आत्म-स्वार्थ को बाहर से न दिखाने पर जोर देते हैं, क्योंकि ऐसा रोग हृदय में पनपता है और वाणी के जरिए प्रकट होता है। अल्बर्ट बार्न्स लिखते हैं कि अच्छाई का वास्तविक परीक्षण वही है जो कठिन परिस्थितियों में भी प्रेम और सत्य को बनाए रखे। एडम क्लार्क बताते हैं कि इस प्रकार का मन चुप होकर भी भिन्न-भिन्न रोगों का कारण बन सकता है, इसलिए आंतरिक परिवर्तन आवश्यक है। (इन theologian-commentary के सारांश सामान्य प्रकृति के हैं; नीचे उद्धृत सटीक पंक्तियाँ संक्षेप में दी गई हैं।)
क्रॉस-रेफरेंसेस
व्यावहारिक विचार
यदि आप अपने मानस में स्वार्थ या ईर्ष्या महसूस करते हैं, तो पहली क्रिया सत्य को स्वीकारना है: मैं क्यों बोल रहा हूँ? क्या यह प्रेम से प्रेरित है या किसी कमी की भरपाई का प्रयास? दूसरा कदम है अभ्यासपूर्वक मधुर और विनम्र संचार को अपनाना—कड़वाहट के स्थान पर करुणा, और झूठ के स्थान पर सत्य। तृतीय, समुदाय से पूछना कि उनके अनुभव में मेरी बातें किस तरह प्रभावित करती हैं; इससे आत्म-निर्भरता से बाहर आकर सच्चे परिवर्तन की दिशा मिलती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
याकूब 3:14 हमें यह सिखाता है कि ईर्ष्या और स्वार्थ से उपजे विचार शब्दों में झलकते हैं और विश्वास के प्रमाण को धूमिल कर देते हैं। वास्तविक धर्म वह है जो हृदय में परिवर्तन और प्रेमपूर्ण, सत्य-संयमित वाणी से परिलक्षित होता है।