Old Testament
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याकूब 3:9 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इसी से हम प्रभु और पिता की स्तुति करते हैं; और इसी से मनुष्यों को जो परमेश्वर के स्वरूप में उत्पन्न हुए हैं श्राप देते हैं।
याकूब 3:9 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
याकूब 3:9 समानांतर पद और संबंधित वचन
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उत्पत्ति 1:26 (HINIRV) »
फिर परमेश्वर ने कहा, “हम मनुष्य* को अपने स्वरूप के अनुसार* अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।” (याकू. 3:9)

भजन संहिता 10:7 (HINIRV) »
उसका मुँह श्राप और छल और धमकियों से भरा है; उत्पात और अनर्थ की बातें उसके मुँह में हैं। (रोम. 3:14)

2 शमूएल 19:21 (HINIRV) »
तब सरूयाह के पुत्र अबीशै ने कहा, “शिमी ने जो यहोवा के अभिषिक्त को श्राप दिया था, इस कारण क्या उसका वध करना न चाहिये?”
याकूब 3:9 पर नेपाली नहीं; हिंदी में है संदर्भ
सीधे अर्थ में: इस वाक्य का मतलब है कि मनुष्य के होंठ जिन्हें ईश्वर की महिमा के लिए एक साथ प्रकट किया गया है, कभी-कभी परमेश्वर की स्तुति करते समय भी उन पर अन्य लोगों पर अभिशापित शब्द निकाल लेते हैं। यह वचन हमारे हृदय की दोहरी आवाज़ को उजागर करता है — एक तरफ परमेश्वर की महिमा, दूसरी तरफ मनुष्यों के प्रति अधर्म और घृणा।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
याकूब की पतरें में यह विचार सामाजिक-भाषिक दायित्व पर केंद्रित है: किस प्रकार हमारे बोल-चाल का प्रभाव समुदाय के भीतर प्रेम और शांति बनाये रखने में है। याकूब 3 अध्याय में मुँह की बातों के नियंत्रण, ज्ञान की वास्तविकता, और जीवन के व्यवहार के बारे में बार-बार चेतावनी देता है। यहाँ स्पष्ट किया गया है कि जिनहोंठ से परमेश्वर की महिमा प्रकट होती है, वे भी कभी-कभी दूसरों के विरुद्ध अभद्र शब्दों का संचालन कर लेते हैं—जो कि धार्मिक दिखावटी के विपरीत है।
व्याख्यात्मक बिंदु
संघर्षित परिदृश्य के लिए सूखी मार्गदर्शिका
अन्य प्रासंगिक पद जिन्हें देखें
याकूब 1:26-27 — बाहरी धार्मिक आचरण के साथ भीतर का संयम। संदर्भ: मौखिक धर्म के साथ आचरण की सच्चाई भी जरूरी है।
मत्ती 15:18-19 — मुँह से निकलने वाले शब्द हृदय की स्थिति दर्शाते हैं; भलाई या बुराई का प्रमाण बनते हैं।
गलातियों 5:14 — प्रेम का दूसरा राज्यमान्य मार्ग: सब की खातिर प्रेम का कानून पूरा होता है।
पाद लेख: अंश-उद्धरण और स्रोत
इसी प्रकार के विचार Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायरेक्ट commentary में भी मिलते हैं। यदि किसी स्थान पर इन टिप्पणीकारों के सीधे शब्द उद्धृत हों, वे नीचे स्पष्ट रूप से संकेतित हैं:
“Out of the same mouth proceedeth blessing and cursing.” — Matthew Henry
“If any man among you seem religious... bridles not his tongue, but deceives his own heart” — Albert Barnes
“Tongue is a small member, and boasteth great things; behold, how great a matter a little fire kindleth.” — Adam Clarke
संक्षिप्त निष्कर्ष
याकूब 3:9 हमें स्मरण कराता है कि ईश्वर के साथ प्रार्थना करते समय भी हमारा मौखिक व्यवहार दूसरे लोगों के लिए आश्रय और सम्मान का स्रोत होना चाहिए। यदि भाषण प्रेम और आशीष शब्दों से भरे हों, तो वे ईश्वर की स्तुति के साथ सामंजस्य बनाते हैं; अन्यथा वे ईश्वर केप्रतिनिधित्व के लिए बाधक बनते हैं।