Old Testament
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याकूब 3:8 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता; वह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती ही नहीं; वह प्राणनाशक विष से भरी हुई है। (भज. 140:3)
याकूब 3:8 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 3:8 समानांतर पद और संबंधित वचन
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रोमियों 3:13 (HINIRV) »
उनका गला खुली हुई कब्र है: उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है: उनके होंठों में साँपों का विष है। (भज. 5:9, भज. 140:3)

भजन संहिता 140:3 (HINIRV) »
उनका बोलना साँप के काटने के समान है, उनके मुँह में नाग का सा विष रहता है। (सेला) (रोम 3:13, याकू. 3:8)

भजन संहिता 55:21 (HINIRV) »
उसके मुँह की बातें तो मक्खन सी चिकनी थी परन्तु उसके मन में लड़ाई की बातें थीं; उसके वचन तेल से अधिक नरम तो थे परन्तु नंगी तलवारें थीं।
याकूब 3:8 का तत्कालीन संदर्भ और पाठ का अर्थ
याकूब के पाठ की यह पंक्ति न केवल जुबान की शक्ति को उजागर करती है, बल्कि यह दर्शाती है कि मनुष्यों में से कौन-सी बात सचमुच नियंत्रण में है और कौन-सी नहीं। संदर्भ एक ऐसे तरीके को परखता है जिसमें व्यावहारिक जीवन में वाणी और आचरण जुड़ते हैं; याकूब कहता है कि जीभ ऐसी चीज है जिसे न तो पूरे व्यक्ति पर शासन मिलता है, न ही वह स्थिर और शुद्ध रहती है।
क्या दिखाता है पाठ का सत्य
याकूब 3:8 कहता है कि जीभ “मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता”—यानी कोई एक व्यक्ति पूरे मनुष्य-स्वभाव पर उसका नियंत्रण नहीं रख सकता। यह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती नहीं, और प्राणनाशक विष से भरी है। यह विचार हमें संकेत देता है कि आचरण के नियंत्रण में वास्तविक सहायता केवल दैवी प्रेरणा और शिक्षित विवेक से मिलती है, न कि आत्म-इच्छा या जोर-जबरदस्ती से।
महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की स्पष्टता
संबंधित बारम्बार उपदेश
1) पवित्रता का लक्ष्य: दैवी सहायता के बिना जीभ सचमुच शुद्ध नहीं रह सकती। पवित्र जीवन के लिए इन्द्रियों के नियंत्रण और मन की प्रसन्नता जरूरी है।
2) वाणी-निरीक्षण: अपने शब्दों की समीक्षा करें; ज़िंदगी में बनाम कलह के बीच चयन जीभ के सही प्रयोग से होगा।
3) नम्रता और सत्यता: भाषा प्यार, संयम और सत्य के साथ जुड़नी चाहिए; झूठ, ग़लतफहमियां और आक्षेप-आवेश से बचना चाहिए।
अनुसंगता: अन्य उद्धरण एवं विचार
पवित्र शिक्षावली में यह विचार-मूलक चेतावनी गहरे रूप में मिलता है कि लोगों की वाणी पर अंकुश केवल आत्म-नियंत्रण से संभव है।
क्रिस्टियन पाथ परम्परा के प्रमुख विचारक (यूनानी भेदों के साथ) मानते हैं कि जीभ की शक्ति वास्तविक जीवन के आचरण को बनाती है; यह केवल ज्ञान नहीं, बल्कि आचरण का परीक्षण है।
आज के संदर्भ में लागू करने योग्य बातें
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त सार)
याकूब 1:19-20 — सरलता से सुनना, बहुत जल्दी बोलना नहीं; क्रोध को विनियमित करना। यह जीभ के नियंत्रण की पूर्व-शर्त है।
भजन 141:3 — प्रभु, हमारी जीभ पर नियंत्रण दे; हमारे शब्दों को हिंसा नहीं, वरन प्रेम से प्रेरित करें।
नीतिवचन 18:21 — जीभ के शब्द जीवन बनाते हैं या मृत्यु; शब्दों के परिणामों की चेतावनी।
निष्कर्षतः, याकूब 3:8 हमें यह स्मरण कराता है कि जीभ एक शक्तिशाली साधन है—यही मनुष्य के चरित्र का दर्पण है, परंतु इसका सही उपयोग ईश्वरीय कृपा और आत्म-नियंत्रण से संभव है।
नोट: इस पassage के लिए विशिष्ट ऐतिहासिक-भाषिक उद्धरण अगर उपलब्ध हों, वे नीचे उद्धृत हुए भागों में संकेतित हैं।