Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 3:1 रोमियों 3:2 रोमियों 3:3 रोमियों 3:4 रोमियों 3:5 रोमियों 3:6 रोमियों 3:7 रोमियों 3:8 रोमियों 3:9 रोमियों 3:10 रोमियों 3:11 रोमियों 3:12 रोमियों 3:13 रोमियों 3:14 रोमियों 3:15 रोमियों 3:16 रोमियों 3:17 रोमियों 3:18 रोमियों 3:19 रोमियों 3:20 रोमियों 3:21 रोमियों 3:22 रोमियों 3:23 रोमियों 3:24 रोमियों 3:25 रोमियों 3:26 रोमियों 3:27 रोमियों 3:28 रोमियों 3:29 रोमियों 3:30 रोमियों 3:31



रोमियों 3:13 का अर्थ
इस पद के मूल अर्थ में कहा गया है: उनके गला खुली हुई कब्र है; उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है; उनके होंठों में साँपों का विष है। इसका संकेत मानव दोष के गहरे चित्र को प्रस्तुत करता है—शास्त्र कहता है कि सभी ने पाप किया है और मार्ग में बाधा डालते हैं। यहां उद्धरित भजन के पद इस विचार को पुष्ट करते हैं कि मानव स्वभाव में छल, पिशाच-जैसी निन्दा और विषाक्त बोलचाल है, जो 하나님 के विश्वसनीय कानून से दूर ले जाती है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
रोमियों की पांडुलिपि में पाप और विश्वास के नियमों के बीच स्पष्ट तुलना दी गई है। इस अंश में पवित्रशास्त्र दर्शाता है कि मानव जाति का नैतिक पतन सार्वभौमिक है और यह मृत्यु के पथ पर डग भरता है जब तक परमेश्वर का उद्धारक उपाय न हो। भजन 5:9 और भजन 140:3 के उद्धरण से यह संकेत मिलता है कि अतीत में यह प्रवृत्ति प्रचलित रही है—क्योंकि बोली के माध्यम से छल और विष फैलते रहे।
व्याख्यात्मक बिंदु
संक्षिप्त थीमैटिक सार
अनुशंसित क्रॉस-रेफरेंसेस
रोमियों 3:10–12 बनाम भजन 14:1–3 की समांतरता: मानव के भीतर बिना कर्म पराप्न नहीं का गुण बताती है कि सभी दिल से गलत हैं; यह प्रवृत्ति उद्धार के बिना स्थिर नहीं रह सकती।
याकूब 3:5–9: भाषण का दुष्प्रभाव और दुष्कर प्रभाव, भाषिक आचरण से भीतर के पाप का बहिर्गमन—बोलचाल की गड़बड़ी से भी चरित्र बनता-बिगड़ता है।
भजन 5:9 और भजन 140:3: शब्दों में छल व विष कैसे सामाजिक जीवन को नुकसान पहुँचाते हैं, इसका छायाचित्र मिलते हैं।
संवादी निष्कर्ष और व्यावहारिक अनुप्रयोग
यह शास्त्र बताता है कि मानव की नैतिक दुर्बलता को केवल धर्मशास्त्र के नियमों से नहीं बदला जा सकता। उद्धारकर्ता के विश्वास के द्वारा ही पुराने पाप के प्रभाव को मिटाया जा सकता है। हमारे बोले गए शब्दों/कथनों का परखना जरूरी है ताकि दया, सत्य और शुद्धता की दिशा में अग्रसर हों।
यदि आप जीवन में सत्य और प्रेम के मार्ग पर चलना चाहते हैं, तो अपने शब्दों के निहितार्थ पर ध्यान दें, और ईश्वर की कृपा से उद्धार की अपेक्षा रखें।
मुख्य उद्धरण-आधार: इस पद के आस-पास के अभिधारणा में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संदर्भित विचार सामंजस्यपूर्ण रूप से सहायक रहते हैं—परन्तु यहाँ हम मूल पाठ के अर्थ पर केंद्रित हैं।