रोमियों 3:19 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

हम जानते हैं, कि व्यवस्था जो कुछ कहती है उन्हीं से कहती है, जो व्यवस्था के अधीन हैं इसलिए कि हर एक मुँह बन्द किया जाए, और सारा संसार परमेश्‍वर के दण्ड के योग्य ठहरे।

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रोमियों 3:19 पद-दर-पद बाइबल टीका

मूल अर्थ का सीधा संकेत

रोमियों 3:19 कहता है: “हम जानते हैं, कि व्यवस्था जो कुछ कहती है उन्हीं से कहती है, जो व्यवस्था के अधीन हैं इसलिए कि हर एक मुँह बन्द किया जाए, और सारा संसार परमेश्वर के दण्ड के योग्य ठहरे।” इस वचन में पौलुस धार्मिक व्यवस्था के भीतर और बाहर दोनों स्थितियों की वास्तविकता बताता है: व्यवस्था के अनुसार हर व्यक्ति जवाबदेह है ताकि हर एक का मुँह बंद हो जाए और सारी दुनिया परमेश्वर के न्याय के सामने दोषी ठहरे।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

रोमियों पत्र एपistle का लक्ष्य है—ईश्वरीय धर्मशास्त्र के अनुसार न्याय की पूर्ण आवश्यकता दिखाना ताकि यहूदियों-गैरयहूदियों दोनों के लिए समान रूप से उद्धार का रास्ता स्पष्ट हो सके। 3:19–20 के पासे में पौलुस दिखाते हैं कि व्यवस्था बाहरी नीतियों तक सीमित है और उसका उद्देश्य रौबदार कानून-आचरण के बजाय हृदय की निष्कलंक पाप-स्वीकृति को उजागर करना है।

interpretive observations

  • व्यवस्था का उद्देश्य: मुँह खोलकर बयान करना कि सभी लोग परमेश्वर के बराबर जवाबदेह हैं, ताकि व्यक्ति अपने पाप के कारण दंड के योग्य ठहरे।
  • दण्ड के योग्यता का निष्कर्ष: बिना किसी अपवाद के, सारा संसार परमेश्वर के करुणा-न्याय के सामने निर्बल और दोषी है।
  • न्याय से मुक्त होने की आवश्यकता: वस्तुतः यह उद्धार की मांग को स्पष्ट करता है कि हमारा पक्षपातपूर्ण भला-भला नहीं, बल्कि दया-भरे उद्धार की आवश्यकता है जो केवल यीशु मसीह द्वारा संभव है।

मौलिक निष्कर्षों के साथ व्यवहारिक संकेत

  1. सार्वजनिक दायित्व: हर व्यक्ति पर भिन्न-भिन्न अपराधों के बावजूद, व्यवस्था सभी पर समान रूप से लागू होती है।
  2. आत्मिक प्रतिक्रिया: यह जानना कि हम कौन नहीं, पर जो हैं—देवत्व-न्याय के सामने हमारी स्थिति स्पष्ट है, ताकि हम क्रोध नहीं बल्कि विश्वास की ओर अग्रसर हों।
  3. उद्धार का मार्ग: उद्धार का संदेश बहुधा कानून के पालन से नहीं, बल्कि पवित्र चरित्र के साथ विश्वास-आचरण में स्थित है; यीशु मसीह ही उस पार का मार्ग दिखाते हैं।

सम्बद्ध पाठ और उनके विचार

1) रोमियों 1–3 के समेकित स्वभाव में, पंक्ति-दर-पंक्ति व्यवस्था के भीतर दोष की सार्वभौमिकता स्पष्ट होती है—यह दर्शाता है कि पाप का दोष सभी पर है, जिससे उद्धार की आवश्यकता उत्पन्न होती है।

2) गलातियों 3:22–24 में स्पष्ट कहा गया है कि न्याय स्वयं ईश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार विश्वास के द्वारा आता है। यह उसी निष्कर्ष की पुष्टि करता है कि कानून-नियम से नहीं, बल्कि विश्वास से उद्धार संभव है।

3) यकरिती के प्रेम-पथ: रोमियों 5:8 जैसे पाठक एक बार फिर देखेंगे कि पाप के भीतर भी प्रेम से निर्भर उद्धार संभव है, जो मसीह के बलिदान से खुलता है।

प्रायोगिक takeaway

यदि आप कानून के मानक से स्वयं को तौलते हैं और महसूस करते हैं कि हर मुँह बंद हो गया है, तो यह संकेत है कि उद्धार का स्रोत केवल परमेश्वर की कृपा में है। अपने आप को धर्मी बनाने की कोशिश छोड़िए और मसीह की पूर्णता, उनकी कृपा और विश्वास के द्वारा उद्धार स्वीकार कीजिए।

कथन-योग्य उद्धरण (public-domain commentators से चयनित)

1) Matthew Henry: “The law shows what men are, but cannot make them just.”

2) Albert Barnes: “The knowledge that all are under sin invites to seek mercy through faith.”

3) Adam Clarke: “By the law is the knowledge of sin, but not the remedy; grace alone provides justification.”

निहित निष्कर्ष: यह पाठ बताता है कि व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य हमारा निर्बलपन उभारना है ताकि हम परमेश्वर की उद्धार-योजना को स्वीकार कर सकें—यही विश्वास का आरम्भ है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

रोमियों 3:19 समानांतर पद और संबंधित वचन

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इसलिए कि जिन्होंने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नाश भी होंगे, और जिन्होंने व्यवस्था पा कर पाप किया, उनका दण्ड व्यवस्था के अनुसार होगा;

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गलातियों 3:10 (HINIRV) »
अतः जितने लोग व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखते हैं, वे सब श्राप के अधीन हैं, क्योंकि लिखा है, “जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है।” (याकू. 2:10,12, व्य. 27:26)

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यहेजकेल 16:63 (HINIRV) »
जिससे तू स्मरण करके लज्जित हो, और लज्जा के मारे फिर कभी मुँह न खोले। यह उस समय होगा, जब मैं तेरे सब कामों को ढाँपूँगा, प्रभु यहोवा की यही वाणी है।” (भज. 78:38)

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