Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 3:1 रोमियों 3:2 रोमियों 3:3 रोमियों 3:4 रोमियों 3:5 रोमियों 3:6 रोमियों 3:7 रोमियों 3:8 रोमियों 3:9 रोमियों 3:10 रोमियों 3:11 रोमियों 3:12 रोमियों 3:13 रोमियों 3:14 रोमियों 3:15 रोमियों 3:16 रोमियों 3:17 रोमियों 3:18 रोमियों 3:19 रोमियों 3:20 रोमियों 3:21 रोमियों 3:22 रोमियों 3:23 रोमियों 3:24 रोमियों 3:25 रोमियों 3:26 रोमियों 3:27 रोमियों 3:28 रोमियों 3:29 रोमियों 3:30 रोमियों 3:31



रोमियों 3:17 का संक्षिप्त अर्थ और संदर्भ
पद 3:17 में पवित्रशास्त्र बताता है कि वे लोग, जो उद्धार को प्राप्त करते हैं, वे कुशल के मार्ग पर नहीं चलते—यानी वेयौवन के समय से सुरक्षा, सही रास्ता और ईश्वरीय निर्देश के अनुसार रहते हैं। संदर्भ में पाप के सार्वभौम स्थिति के बीच, पौलुस यह दिखाते हैं कि सब लोग चतुराई से नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठ आचरण और ईश्वर के नियमों को मानकर ही उद्धार की ओर बढ़ते हैं। यह विचार यशया की भविष्यवाणी “कुशल का मार्ग नहीं जाना” से मेल खाती है, जो चिन्हित करता है कि मानव प्रयास से नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा से ही उद्धार संभव है।
मुख्य अभिप्राय
इसVerse का मूल संदेश यही है: सारे मानव समाज को ईश्वर के मार्ग से भटकाव है; उद्धार के लिए मनुष्य को अपनी निर्बलताओं को स्वीकार करना होगा और ईश्वर के सही मार्ग पर लौटना होगा। यह स्पष्ट करता है कि धार्मिक कर्मकांड या अपनी अपनी विवेक से उद्धार नहीं मिलता, बल्कि उनकी नींव ईश्वर की कृपा और धर्मी आदेश के पालन में है।
तीन प्रमुख विषय
संबद्ध पद और उनके संदेश
यशया 59:8 जैसे संदर्भ इस विचार को पुष्ट करते हैं कि शांति और न्याय का रास्ता मनुष्य द्वारा बना नहीं सकता। रोमियों 3 की इस discussion में भी पॉलुस यह दर्शाते हैं कि धार्मिक पुण्य भी कभी-कभी पथभ्रष्ट कर सकता है यदि वह निर्भरता से बाहर नहीं आता।
यथार्थ अनुप्रयोग
जीवन में हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि उद्धार सिर्फ किसी धार्मिक रस्मों या मानवीय उन्नति से नहीं आता; यह ईश्वर की कृपा पर निर्भर है और उसे मानकर चलना है। अपने दैनिक निर्णयों में, हमें विश्वास, नम्रता और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए—खासकर तब जब समाज में आधुनिक कठिनाइयाँ और भ्रम बढ़ रहे हों।
क्रॉस-रेफरेंसेज़ (संक्षिप्त व्याख्या)
1) रोम 1:17 — विश्वास की righteousness ईश्वर के मार्ग में ठहरती है, न कि मानव द्वारा जन्मे नियमों के अनुसार। यह दिखाता है कि करुणा और विश्वास उद्धार के मूल स्रोत हैं।
2) यशये 59:8 — न्याय और शांति के मार्ग अविश्वास और पाप से भिन्न होते हैं; मानव प्रयास से वह मार्ग नहीं बनते।
3) गलातियों 3:11 — चूँकि व्यक्ति को धर्म के अनुसार उद्धार नहीं मिलता, बल्कि faith के द्वारा प्राप्त होता है, यह पौराणिक विचार से भी मेल खाता है कि कानून की बराबरी से उद्धार नहीं मिलता।
संक्षिप्त निष्कर्ष
रोमियों 3:17 इस बात पर प्रकाश डालता है कि हम परमेश्वर के मार्ग पर चलें—जोकि उद्धार का सुरक्षित और सही रास्ता है—न कि अपनी कुशलता या सामाजिक परंपराओं पर निर्भर रहें। इससे प्रेरित होकर विश्वासियों को अपने जीवन में ईश्वर की दिशा को प्राथमिकता देनी चाहिए और उसकी कृपा पर निर्भर रहते हुए सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए।
नोट: इस प्रवचन में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विशिष्ट उद्धरण अगर उपलब्ध हों, तो नीचे उद्धृत किये गए हैं।
उद्धरणधारणा: “नहीं जाना कुशल का मार्ग” इस संदेश के साथ सीधे जुड़ता है कि उद्धार की कुंजी ईश्वर की करुणा में है, न कि मनुष्य के कर्मों में।