Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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रोमियों 3:25 का पार्श्व-प्रसंग और उसका सार
यह पद रोमियों की पुस्तक के धार्मिक-न्याय के सिद्धांतों से जुड़ता है, जब पौलुस यह बताने का प्रयास करते हैं कि परमेश्वर ने यीशु के लहू के कारण इस्लामत न बनाकर नये प्रायश्चित्त की व्यवस्था कैसे सक्षम की। विशिष्ट रूप से यह बताता है कि विश्वास के द्वारा वह “प्रायश्चित” कार्य परिणामस्वरूप प्रगट होता है — परमेश्वर की धार्मिकता के प्रकाश में, उन लोगों के लिए जो पहले पाप कर चुके हैं और जिन पर उसकी धैर्य ने यह चुकौती दिखायी है, ताकि उनके बारे में परमेश्वर अपनी धार्मिकता प्रकट करे।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से उभरते संकेत
पौलुस यहां दिखाते हैं कि परमेश्वर ने अपने विषय में एक योजना रखी है जिसमें विश्वास ही वह मार्ग है जिससे पापों का दुष्कर प्रभाव दूर होता है। “उनके लहू के कारण” एक ऐसी पूर्ति है जो केवल ईश्वर की कृपा से संभव है; यह तब है जब इंसान खुद अपने किये का भुगतान नहीं कर सकता। इसके साथ साथ यह भी स्पष्ट होता है कि धर्मी बनने की प्रक्रिया कर्मों से नहीं, बल्कि विश्वास से है; यद्दपि कर्म भी न केवल अनुपस्थित हैं, बल्कि परिवर्तन की प्रकृति को दर्शाते हैं जो विश्वास के फलस्वरूप उभरते हैं।
शब्दों एवं चित्रों की स्पष्ट व्याख्या
- प्रायश्चित्त: पाप के परिणामों को ढकने और परमेश्वर के सामने पुनः स्वीकार्य स्थिति देने की वह व्यवस्था जो यीशु के बलिदान से प्रेरित है।
- “लहू” का अर्थ: पुराने नियम में भी बलिदान के लिए रक्त का महत्व रहा है; यहाँ यह बताता है कि शु़द्धि और पाप से मुक्ति कैसे एक वास्तविक, बहती हुई आहूति के माध्यम से आती है।
- विश्वास कार्यकारी होते हैं: यह इंगित करता है कि भरोसा केवल मानसिक समझ नहीं, बल्कि एक अस्तित्वगत परिवर्तन है जो कर्मों और जीवनधारा में दिखता है।
अन्य सम्बद्ध अवसर-शास्त्र
कई अन्य हिस्सों में भी दिखता है कि आस्था से प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है: रोमियों 4-6 में विश्वास का न्याय की कसौटी के रूप में वर्णन, (यद्यपि यहाँ स्पष्टता से यह कहा गया है कि कर्म से नहीं बल्कि विश्वास से प्रायश्चित्त होता है); 1 यूहन्ना 2:2 और 1 पतरस 1:19-20 सेäh परमेश्वर के स्वभाव और बलिदान की महत्ता-संबंधी विचार मिलते हैं कि पाप का भुगतान एक ऐसी उपलब्धि है जिसे मनुष्य अपने बल से नहीं कर सकता।
ऐतिहासिक टिप्पणीकारों के संकेत
यद्यपि यह पाठ सार्वजनिक-डोमिनेशन पब्लिक-डोमेन टिप्पणीकारों के अंग हैं, मैथ्यू हेनरी और ऐल्बर्ट बार्न्स क्लार्क आदि के तर्कों में एक समान धारा है: परमेश्वर की धर्मनिष्ठा और विश्वास के उपज रूप में पाप-क्षमा का सच्चा मार्ग। संकलित से कुछ सार्थक बातें: “धर्मी केवल कर्मों से नहीं, बल्कि विश्वास से प्रगट होते हैं,”—ये विचार पाठ के भीतर एकीकृत संकेत के रूप में जाते हैं। (उद्धरण के तौर पर जो वाक्यरूप उद्धृत किए जाते हैं, वे नीचे सीधे उद्धृत नहीं होते, पर इन विद्वानों के सामान्य विचार का संकेत यहां दिया गया है।)
आज के सन्दर्भ में अनुप्रयोग
1) विश्वास की पुख्ता नींव लें: पाप के परिणामों से बचाव केवल धार्मिक दृष्टिकोण नहीं, बल्कि एक जीवित भरोसे में है जो कर्मों के साथ प्रकट होता है।
2) परमेश्वर की धैर्य-कथा: यदि इतिहास में पहले पाप हुए थे, तब भी परमेश्वर की सहनशीलता और समय-सारिणी बताती है कि कब और कैसे संतुष्टि संभव है, और यह विश्वास के द्वारा स्वीकार्य है।
3) जीवन-चर्या में परिवर्तन: प्रायश्चित्त का तात्पर्य केवल कानूनी उपचार नहीं, बल्कि आचरण में बदलाव है, जो ईश्वरीय धार्मिकता की प्रकटता को दर्शाता है।
छोटा संदर्भ-चक्र
इस प्रकार, रोमियों 3:25 हमें यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर की धार्मिकता को प्रकट करना विश्वास के द्वारा ही संभव है—यह वह प्रायश्चित्त है जो पहले के पापों को ढक देता है और नई जीवनधारा बताता है, जिससे परमेश्वर स्वयंकृत न्याय दिखाते हैं।