रोमियों 3:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

कदापि नहीं! नहीं तो परमेश्‍वर कैसे जगत का न्याय करेगा?

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रोमियों 3:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

रोमियों 3:6 — संक्षिप्त व्याख्या और संदर्भ

पौलुस यहाँ यह पूछता है कि यदि कुछ लोग पाप करते हैं तो क्या इससे परमेश्वर का न्याय और नियम निरर्थक हो जाता है। इसका संदर्भ पहले के वाक्यों में धर्म के नियम और मानव पाप के प्रश्न से जुड़ा है: यदि मनुष्य की बुराई से परमेश्वर का न्याय प्रभावित होता हो तो क्या परमेश्वर की नपाई मानी नहीं जाएगी? पौलुस तर्क देता है कि ऐसा नहीं हो सकता।

मुख्य अर्थ

यह पद स्पष्ट नकार है: पाप के कारण परमेश्वर का न्याय कमजोर नहीं पड़ता। परमेश्वर का न्याय स्वभावतः सत्य और स्थिर है; मनुष्य के गलत काम उससे परमेश्वर की निष्ठा या निर्णय की अवहेलना नहीं कर पाते। पौलुस का आशय है कि पाप की वास्तविकता परमेश्वर की दया या न्याय को कम नहीं करती—बल्कि पाप ही न्याय की आवश्यकता और प्रमाण है।

प्रमुख विषय

  • परमेश्वर का अपरिवर्तनीय न्याय — परमेश्वर का न्याय स्थिर और अपरिहार्य है; मानव अधर्म इसे हटाने में सक्षम नहीं।
  • पाप की पहचान और आवश्यकता — पाप की उपस्थिति न्याय की आवश्यकता को दर्शाती है; यही कारण है कि उद्धार और न्याय के सिद्धांत जरूरी हैं।
  • परमेश्वर की स्वामित्वपूर्ण कार्रवाई — परमेश्वर पाप के बावजूद न्याय करता है और अपनी सच्चाई के अनुसार काम करता है।

संबंधित पद और उनका सम्बन्ध

रोमियों 3:3–5 — वही तर्क प्रदेश को आगे बढ़ाते हैं; विशेषकर 3:4 में पौलुस लिखते हैं कि "परमेश्वर सत्य ठहरा" — यह विचार 3:6 के नकार को समर्थन देता है।

यशायाह 59:2 — पाप और ईश्वर के साथ भेदभाव की धारणा; यह बताता है कि पाप और न्याय का सम्बन्ध पुराना और बुनियादी है।

व्यावहारिक चिंतन

यह पद हमें दो तरह से प्रभावित करता है: पहला, यह हमें अपनी गलतियों को परमेश्वर की पहचान और न्याय से अलग नहीं करने देता — हम जिम्मेदार हैं। दूसरा, यह हमें आश्वस्त करता है कि परमेश्वर की न्यायप्रियता और सच्चाई स्थिर हैं; पिछले पदों के अनुरूप, यह आशा देता है कि उद्धार और धर्मशास्त्र का आधार दृढ़ है। व्यक्तिगत जीवन में इसका अर्थ है पाप की गंभीरता को समझना और परमेश्वर की न्यायप्रियता के समक्ष पश्चाताप तथा विश्वास के द्वारा जीवन परिवर्तित करना।

संदर्भित टिप्पणीकारों की संक्षिप्त टिप्पणियाँ

मैथ्यू हेनरी लिखते हैं (संक्षेप): "नहीं तो परमेश्वर कैसे जगत का न्याय करेगा?" — यह प्रश्न पाप की परिस्थिति में ईश्वर के प्रभुत्व और न्याय की शक्ति पर प्रकाश डालता है। (उद्धरण: छोटा अंश से व्याख्यात्मक परिभाषा)।

अल्बर्ट बार्न्स का सार यह है कि पाप परमेश्वर के स्वरूप या न्याय की आवश्यकता को खारिज नहीं कर सकता; वह मनुष्य की गलतियों के बावजूद सत्य को स्थापित रखता है।

संक्षेप

रोमियों 3:6 हमें याद दिलाता है कि मानव पाप परमेश्वर के न्याय को अस्वीकार या समाप्त नहीं कर सकता। पौलुस का निश्चय यह है कि परमेश्वर की न्यायप्रियता अपरिवर्तनीय है; पाप केवल न्याय की आवश्यकता और परमेश्वर की धैर्य तथा दया को उजागर करता है। इस सत्य से प्रेरित होकर हमें पाप का गंभीर विश्वासपूर्वक सामना करना चाहिए और परमेश्वर के समक्ष पश्चाताप तथा विश्वास के मार्ग पर चलना चाहिए।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

रोमियों 3:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिसमें वह उस मनुष्य के द्वारा धार्मिकता से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है।” (भज. 9:8, भज. 72:2-4, भज. 96:13, भज. 98:9, यशा. 2:4)

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