Old Testament
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लूका 10:1 लूका 10:2 लूका 10:3 लूका 10:4 लूका 10:5 लूका 10:6 लूका 10:7 लूका 10:8 लूका 10:9 लूका 10:10 लूका 10:11 लूका 10:12 लूका 10:13 लूका 10:14 लूका 10:15 लूका 10:16 लूका 10:17 लूका 10:18 लूका 10:19 लूका 10:20 लूका 10:21 लूका 10:22 लूका 10:23 लूका 10:24 लूका 10:25 लूका 10:26 लूका 10:27 लूका 10:28 लूका 10:29 लूका 10:30 लूका 10:31 लूका 10:32 लूका 10:33 लूका 10:34 लूका 10:35 लूका 10:36 लूका 10:37 लूका 10:38 लूका 10:39 लूका 10:40 लूका 10:41 लूका 10:42



लूका 10:10 का संदर्भ और उसका अर्थ
पत्र भेजने वाले प्रयुक्त मिशनरी संदेश में Jesus ने कहा, कि जो नगर नहीं स्वागत दे वहाँ के बाजारों में जाओ और अपना संदेश फैलाओ। यह पाठातिथ्य-स्वागत की उम्मीद पर नहीं टिकता, बल्कि यह दिखाता है कि ईश्वर का राज सदा सम्मान नहीं पाता—परन्तु साक्ष्य और प्रतिउत्तर के बीच धर्मयात्रा जारी रहती है। यदि ग्रहण न मिले, तब भी प्रचार अपने उद्देश्य को पूरा करता है: प्रभु के राज का प्रकाश हर तबके तक पहुँचे।
मूलभूत अर्थ
यह वाक्य शिष्य-प्रेषण के चरणों के बीच की वास्तविकता को प्रस्तुत करता है: उपलब्ध अवसर मिलते-न मिलते, संदेशवाहक को निर्बाध रूप से मार्गक्रमण करना है। ग्राम-स्तर पर अस्वीकार मिलने पर भी, कपड़े-समझौते नहीं होते; शास्त्र कहते हैं कि विवेक और समर्पण के साथ स्थान-स्थान पर पहुँचना चाहिए।
तीन प्रमुख थीम
संदर्भित विचार-प्रबन्ध (Cross-references)
1) मत्ती 10:14-14: शिष्यों के नगर के प्रति निर्गमन और अस्वीकृति के समय की व्यवहारिकता; प्रयोगिक मार्गदर्शन देता है कि कैसे लोक-परिवर्तन के बीच शांति और विनम्रता बनाए रखें।
2) सीटिका 9:35-38; ईश्वर के राज्य के लिये मसीह के संदेश की व्यापकता और उद्धार की अपील का सामंजस्य।
3) मार्क 6:11; यदि नगर-जन अस्वीकार करें, तो उसे छोड़कर अन्य गाँव की ओर जाना चाहिए—निर्णय-आचरण का स्पष्ट मार्ग।
व्यावहारिक विचार
हम भी अपने जीवन में कभी-कभी उसी परिस्थिति का सामना करते हैं—जहाँ हमारी बुनियादी बात स्वीकार नहीं पाई जाती। इस पाठ से प्रेरणा मिलती है कि भले निष्कर्ष-स्वीकृति कम हो, परन्तु सत्य को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करने की प्रेरणा बनी रहे। साथ ही, नम्रता और विनम्रता बनाये रखना महत्त्वपूर्ण है, ताकि संदेश वही रहे जो जीवन परिवर्तन का कारण बन सके।
संयुक्त सार
लूका 10:10 यह याद दिलाता है कि मिशन-यात्रा के प्रत्येक कदम में न केवल अवसर प्राप्त होते हैं बल्कि अस्वीकृति भी आती है। परन्तु प्रभु के निर्देश के अनुसार, जहाँ भी संभव हो वहाँ पहुँचना चाहिए—ताकि ईश्वर का संदेश सभी तक पहुँचे। यह पाठ हमें साक्ष्य-प्रेषण में धैर्य, विनम्रता और दृढ़ता की शिक्षा देता है, और याद दिलाता है कि परिणाम परमेश्वर के हाथ में हैं।
पीछे के संदर्भों से उद्धरण नहीं दिए गए, परन्तु Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के समेकित विचारों के अनुसार, यदि आवश्यक हो तो उन्होंने सहज मार्गदर्शन दिए हैं: “यात्रा में विनम्रता बनाए रखें; अस्वीकृति में भी आत्म-समर्पण न छोड़े,” आदि व्युत्पन्न पंक्ति-भाव।