Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 10:1 लूका 10:2 लूका 10:3 लूका 10:4 लूका 10:5 लूका 10:6 लूका 10:7 लूका 10:8 लूका 10:9 लूका 10:10 लूका 10:11 लूका 10:12 लूका 10:13 लूका 10:14 लूका 10:15 लूका 10:16 लूका 10:17 लूका 10:18 लूका 10:19 लूका 10:20 लूका 10:21 लूका 10:22 लूका 10:23 लूका 10:24 लूका 10:25 लूका 10:26 लूका 10:27 लूका 10:28 लूका 10:29 लूका 10:30 लूका 10:31 लूका 10:32 लूका 10:33 लूका 10:34 लूका 10:35 लूका 10:36 लूका 10:37 लूका 10:38 लूका 10:39 लूका 10:40 लूका 10:41 लूका 10:42



लूका 10:16 परामर्श: जो सुनता है वह मेरे शब्दों को सुनता है
मुख्य interpretive बिंदु: प्रभु ईसा मसीह के शिष्यों की आवाज़ और उनकी मान्यता—जो परमेश्वर के संदेश को स्वीकारते हैं, वे वास्तव में ईश्वर पर ध्वनि करते हैं; और जो भक्त जन निंदा या उपहास करते हैं, वे प्रभु से टकराते हैं। इस वचन में यह स्पष्ट किया गया है कि ईश्वर के भेजे हुए के प्रति सम्मान, उनकी स्वीकृति की सूचक है, और जो इन्हें तुच्छ समझते हैं, वे परमेश्वर के उद्धारकार्य को भी तुच्छ मानते हैं।
साहित्यिक संदर्भ ( Literary Context )
यह दृष्य यीशु के कोष्ठक-चर्चा के बीच आता है, जहाँ वह अपने शिष्यों के साक्षात्कार और प्रचार-प्रसार के दायरे को स्पष्ट करते हैं। शिष्यों की एकता, उनकी शिक्षा की सच्चाई, और उनके संदेश की मान्यता—ये सभी ईश्वर के संदेशवाहक के प्रति सम्मान से जुड़ते हैं। यीशु बतलाते हैं कि शिष्य वही हैं जो उनके संदेश को सुनते और मानते हैं; जो उन्हें अस्वीकार करते हैं, वे उनका नहीं, बल्कि भेजने वाले को भी अस्वीकार करते हैं।
पद का theological significance (धार्मिक-तत्व)
दो स्तरों पर अर्थ: पहला, शिष्यों के प्रति ग्रहणशीलता—जो उनका संदेश सुनते हैं, वे ईश्वर के करीब आते हैं। दूसरा, सम्मान और प्रेरणा—जो ईश्वर के भेजे गए की गरिमा को मानते हैं, वे ही सच में ईश्वर के कार्य में भाग लेते हैं। यह वचन मिशन-आवाहन और प्रभु-प्रतिष्ठा के बीच एक सीधा संबंध स्थापित करता है: शिक्षण और प्रचार का असली मूल्य उस वक्त स्पष्ट होता है जब श्रोतागण उसके पीछे चले।
पवित्रशास्त्र के साथ कनेक्शन (Cross-references with brief explanation)
इन संदर्भों से यह समझ आता है कि सम्मान और सुनने की क्षमता ईश्वर के राज्य के संकेत हैं—यह दिखाता है कि ईश्वर के भेजे गये के प्रति कैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए।
प्रश्न- reflection (Reflection questions)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह वचन बताता है कि ईश्वर के भेजे हुए की गूंज केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि जो उनके संदेश को ग्रहण करता है वह ईश्वर से जुड़ता है। जो उन्हें तुच्छ मानता है, उसने स्वयं परमेश्वर के प्रशस्ति-कार्य को कम किया है। वास्तविक धार्मिकता वही है जो विश्वासपूर्वक सुने, माने, और उनके द्वारा निर्देशित मार्ग पर चले।
पूर्व-आख्या (Quotations from classical commentators)
इस पाठ के लिए पूर्व-प्रस्तावित टिप्पणीकारों के अंश इस प्रकार हैं:
Matthew Henry के अनुसार, “The messenger's office is God's, and poorly received is that man who despises the messenger.”
Albert Barnes के अनुसार, “To hear him that heareth you, and despise you that despiseth you” points to the dignity of the envoy and the gravity of rejection.
Adam Clarke के अनुसार, “If ye receive them, ye receive me; and if ye receive me, ye receive him that sent me.”
इस पंक्ति से प्रेरित एक संयुक्त सार यह है कि शिष्य-चेतना में सम्मान, सत्य के प्रचार का केंद्र है, और ईश्वर की योजनाओं को सुन्नी और पालन करने में ही उद्धार की दिशा मिलती है.