Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 29:1 नीतिवचन 29:2 नीतिवचन 29:3 नीतिवचन 29:4 नीतिवचन 29:5 नीतिवचन 29:6 नीतिवचन 29:7 नीतिवचन 29:8 नीतिवचन 29:9 नीतिवचन 29:10 नीतिवचन 29:11 नीतिवचन 29:12 नीतिवचन 29:13 नीतिवचन 29:14 नीतिवचन 29:15 नीतिवचन 29:16 नीतिवचन 29:17 नीतिवचन 29:18 नीतिवचन 29:19 नीतिवचन 29:20 नीतिवचन 29:21 नीतिवचन 29:22 नीतिवचन 29:23 नीतिवचन 29:24 नीतिवचन 29:25 नीतिवचन 29:26 नीतिवचन 29:27



नीतिवचन 29:22 — क्रोधी मनुष्य और उसकी जिम्मेदारी
पथ-परिचय: यह श्लोक एक स्पष्ट दृश्य देता है: जो व्यक्ति क्रोध को अपने नियंत्रण से बाहर छोड़ देता है, वह झगड़ा उठाने वाला होता है और जो अत्यन्त क्रोध से भर जाता है, वही अपराधी बन जाता है। यहाँ क्रोध का प्राकृतिक अवतार नहीं, बल्कि उसका नियंत्रण खोना और समाज में विनाशकारी व्यवहार फैलना दिखाया गया है।
ईश्वर की शिक्षा के प्रकाश में पाठ का भाव
इस वाक्य में सतर्क चेतावनी है कि परमेश्वर के सामने हमारी सोच-समझ और नियंत्रण कैसे दिखते हैं। हाँ, क्रोध एक मानवीय अनुभूति है, परन्तु उसका असंतुलित प्रयोग समाज में निरंतर कलह और अन्याय का कारण बनता है। ईश्वर हमारे दिल की प्रतिक्रिया को देखता है और हमें भीतर से परिवर्तन करने के लिए बुलाते हैं—ताकि nuestras क्रोध स्थिति में भी सत्य, दया और संयम बना रहे।
शब्दार्थ और imagery का स्पष्टीकरण
शास्त्रीय प्रकाशन से संबद्ध विचार
इस श्लोक में अन्य प्रसिद्ध विवेचकों के समन्वित दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि क्रोध का नियंत्रण आत्म-परख और पवित्र नैतिकता के लिए आवश्यक है।
मैथ्यू हेनरी (Matthew Henry) के अनुसार: “क्रोध के गुदगुदाने वाले प्रभाव झगड़े को बढ़ाते हैं और क्रोधी लोग अक्सर नुकसानी के कगार पर पहुँचते हैं।” (संकेतिप्त सार)
एल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) के अनुसार: “क्रोध एक ऐसी पंक्ति है जो नियंत्रण खोने पर समाज को क्षति पहुँचाती है; संयम के बिना व्यक्ति अपने सबसे बड़े हितों को भी नुकसान पहुँचाता है।”
एडम क्लार्क (Adam Clarke) के अनुसार: “क्रोध का दमन न कर पाने पर व्यक्ति अपने आचरण से धर्म-सत्य से विचलित होता है और परिणामस्वरूप अनेक अपराधों के मार्ग पर कदम बढ़ा देता है।”
अन्य संदर्भ से सम्बद्ध विचार
– नीतिवचन 16:32 बताता है कि धैर्य से अधिक शक्तिशाली कौन है, और कोण सा नियंत्रण सबसे बड़ा।
– गलातियों के बजाय प्रेम से बात करना और यथार्थवादी समाधान निकालना सर्वोत्तम मार्ग है।
आज के संदर्भ में अनुप्रयोग
छोटी cross-references (संक्षेप में)
– कूट-उद्धरण नहीं, परन्तु अन्य स्थानों पर क्रोध के परिणाम और संयम का महत्व स्पष्ट मिलता है; इसमें प्रेरणा मिलती है कि संयम से ही विश्वास, प्रेम और न्याय कायम रह सकते हैं।
यह श्लोक शिक्षा देता है कि मानव के क्रोध को मंदिर में रहने दें, न कि समाज के भीतर अराजकता फैलाने दें। ईश्वर की दया से, हम अपने व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं और अपने दिव्य बुलावे के अनुसार जीवन जी सकते हैं।