1 राजाओं 8:52 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इसलिए तेरी आँखें तेरे दास की गिड़गिड़ाहट और तेरी प्रजा इस्राएल की गिड़गिड़ाहट की ओर ऐसी खुली रहें, कि जब-जब वे तुझे पुकारें, तब-तब तू उनकी सुन ले;

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1 राजाओं 8:52 पद-दर-पद बाइबल टीका

1 राजाओं 8:52 — संदर्भ में सम्पुट: दुआ और धैर्य की आर्त पुकार

प्रसंग का तात्पर्य है कि परमेश्वर ने दाऊद के पुत्र राजा को अपने राज्यों के लोगों की गिड़गिड़ाहट और उद्धार के समय ध्यान देने की आवश्यकता सिखाई। यह पाठ ऐसे समय का चित्रण करता है जब इस्राएल के लोग अपनी रोशनी, प्यास और संकट के क्षणों में ईश्वर को पुकारते हैं, और ईश्वर उनकी पुकार सुनते हैं।

ईश्वर के प्रति दृष्टि: दया और सुनवाई

यह वाक्य ईश्वर की दयालुता और उसकी सुनवाई की गहराई को उद्घाटित करता है — दास और प्रजा की गिड़गिड़ाहट पर भी ईश्वर की आँखें खुली रहती हैं। परमेश्वर अपने लोगों के सर्वस्वीकार करने वाले स्वभाव के साथ जुड़ा रहता है: वे यदि सचमुच पुकारते हैं, तो वह उन्हें सुनता है। यह संदर्भ नव-चर्चित विश्वास के भीतर एक स्थिर आशा बनाता है कि प्रभु न केवल महानता में प्रत्यक्ष है, बल्कि व्यक्तिगत, सन्निकट और समय पर मधुर सुनवाई भी प्रदान करता है।

मुख्य शब्दों के अर्थ

  • गिड़गिड़ाहट: गड़गड़ाहट या दया-याचिका की तीव्रता के साथ की गई प्रार्थना, जो बीच-बीच में विश्वास के संघर्ष और सच्ची निर्भरता को दर्शाती है।
  • आंखें खुली रखना: परमेश्वर का सतर्क, संवेदनशील प्रेम — वह हर प्रार्थना को ध्यान से देखता है और उसे महत्व देता है।
  • ताक और समय: संकट के घड़ी में ईश्वर की प्रतिक्रिया का समय, जो न्याय और कृपा के संतुलन को दर्शाता है।

अन्य प्रेरित पाठ

इस अनुभाग की प्रकृति यह दिखाती है कि भगवान प्रत्येक दास की पुकार को सुनते हैं। अन्य सन्दर्भ जहां प्रभु की सुनवाई स्पष्ट होती है:

  • Psalm 34:17-18 — दुष्टों का cry पहुँचते ही प्रभु निकट है और टूटे दिलों को बचाता है। यह क्रिया-प्रतिकार का एक प्रत्यक्ष चित्र है।
  • Psalm 77:1-2 — कष्ट के समय यहूदियों की पुकार पर भगवान का ध्यान; आक्रांत स्पष्ट रूप से उनकी गिड़गिड़ाहट में शामिल है।
  • Daniel 9:18-19 — दया के हृदय से परमेश्वर के सम्मुख विनयपूर्वक पाठ; पुकार और क्षमा साथ चलते हैं।

पूर्व-पाठों से संकल्प और आज

राजाओं के इस दुआ-घड़ी में हम देखते हैं कि प्रजा एकजुट होकर दीन-ता परमेश्वर के प्रति निर्भर रहती है। यह पाठ आज भी प्रेरित करता है कि संकट, अपराध, या भविष्य के प्रश्नों के सामने हम कैसे प्रतिक्रिया दें: निरर्थक चिंता की जगह आस्था से पुकारना, और विश्वास के साथ प्रतीक्षा करना।

आज-के-युग के लिए अनुप्रयोग

आपात समय में भी प्रभु की सुनवाई संभव है; सत्य यह है कि ईश्वर अपने लोगों को ध्यान से देखता है और उन्हें समय पर उत्तर देता है यदि हमारी प्रार्थनाएँ ईमानदार, विनम्र और परमेश्वर की इच्छा के अनुरोध हों। व्यक्तिगत कठिनाइयों, परिवार की आपदाओं या समुदाय के संकट में, आत्म-समर्पण और विश्वास के साथ प्रार्थना करें; फिर धैर्यपूर्वक ईश्वर के उत्तर के लिए प्रतीक्षा करें।

अनुमोदित टिप्पणीकारों की संक्षिप्त धारणा

यह संदेश उठती ध्वनि को दो भागों में समेटता है: प्रभु की कृपा और मानवता की निर्भरता। मार्थिया हेनरी, ऐलबर्ट बार्न्स और अॅडम क्लार्क के मानक टिप्पणियों के अनुसार, यह पाठ हमें यह सिखाता है कि दु:ख के क्षणों में परमेश्वर की नज़D और प्रतिक्रिया में स्थिरता कैसे बनती है। उनके अनुसार, परमेश्वर की सुनवाई कभी विफल नहीं हो सकती; यह विश्वास की गहराई को मजबूत बनाती है और प्रार्थना-जीवन को सत्य के साथ जोडती है।

कई अनुवादक-व्याख्या में यह संकेत विशिष्ट है कि परमेश्वर दासों और प्रजा की पुकार को स्मरण रखते हैं और तुरन्त नहीं भी, परन्तु समयानुसार उत्तर देते हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

1 राजाओं 8:52 समानांतर पद और संबंधित वचन

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1 राजाओं 8:29 (HINIRV) »
कि तेरी आँख इस भवन की ओर अर्थात् इसी स्थान की ओर जिसके विषय तूने कहा है, 'मेरा नाम वहाँ रहेगा,' रात दिन खुली रहें और जो प्रार्थना तेरा दास इस स्थान की ओर करे, उसे तू सुन ले।

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भजन संहिता 145:18 (HINIRV) »
जितने यहोवा को पुकारते हैं, अर्थात् जितने उसको सच्चाई से पुकारते है; उन सभी के वह निकट रहता है*।

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2 इतिहास 6:40 (HINIRV) »
और हे मेरे परमेश्‍वर! जो प्रार्थना इस स्थान में की जाए उसकी ओर अपनी आँखें खोले रह और अपने कान लगाए रख।

1 राजाओं 8 (HINIRV) Verse Selection

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