Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31

मुख्य व्याख्या बिंदु
1 शमूएल 31:5 में शाऊल के समापन का द्रष्टव्य मात्रक है: शत्रु के नीचे न हार मानकर उसने स्वयं अपने जीवन का निर्णय कर लिया और उसका घुड़सवार साथी भी उसकी मौत के साथ जुड़ गया। यह पंक्ति न केवल शाऊल की सत्ता के अंत को दर्शाती है बल्कि नेतृत्व के भयाक्रांत परिणाम और राज्य के विगत विपत्ति के गम्भीर प्रभाव को उजागर करती है।
पाठ की साहित्यिक संदर्भ में विश्लेषण
यह पद एक स्पष्ट, कटु तर्क के साथ नतीजे की ओर बढ़ता है: सैनिकों की सुरक्षा और नेतृत्व की जिम्मेदारी का भारी दबाव। तालवार पर गिरना, डर और वीरता के मर्यादित मानदंडों के विपरीत, संभवतः युद्ध के समुद्र में एक व्यक्तिगत निर्णय की कठोरता को दिखाता है। यह दृश्य उसी कहानी का भाग है जिसमें इस्राइल का राजा एक समय सीमा के भीतर अपनी सत्ता का अंत स्वीकार करता है।
धार्मिक-प्रशंसात्मक महत्त्व
यह घटना ऐसे नेताओं के लिए चेतावनी है जो अपने लोगों के लिए अटूट मार्गदर्शक बनना चाहते हैं, किन्तु अपने भय के कारण मार्ग को छोड़ देते हैं। एक धार्मिक पाठक के लिए यह आत्म-त्याग बनाम आत्म-जीवित रहने की धारणाओं पर विचार कराता है: क्या एक राजा को अपने प्राणों की कीमत पर सिंहासन बचाना चाहिए, और क्या यह वीरता है या निराशा की प्रवृत्ति?
पठन-जीवन में तीन跨-शास्त्री विचार
ग्रंथ-संयोजन और पारस्परिक सम्बन्ध
सूचना के लिए तीन cross-references के साथ संक्षिप्त संकेत:
Reflection के लिए प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
1 शमूएल 31:5 हमें दिखाता है कि सत्ता की चकाचौंध भय और विवेक के परे जाती है जब व्यक्ति अपने कर्तव्य से च्युत हो जाता है। शाऊल के अंत से यह सीख मिलती है कि वीरता केवल बाहरी प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि आंतरिक आस्था और परमेश्वर के लिए जीवन के निर्णयों में स्थिरता है।