Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31



1 शमूएल 31:4 — संदर्भ में वसुधा और निश्चय का संकल्प
यह पद सभा-युद्ध के अंतिम क्षणों में शाऊल की व्यक्तिगत पीड़ा और नेतृत्व-विरोधी स्थिति की आवाज है। पंक्ति में राजा शाऊल अपने आप को बिथन-युद्ध की निराशाजनक स्थिति में पाता है, और मौत को स्वीकारने के लिए अपनी तलवार माँगते हैं ताकि वे मनुष्यों के उपहास से बचा जा सके। यह त्रासदी उसका अंधकार-क्षेत्र है: एक राजा जो परमेश्वर के आदेशों से दूर चला गया था, वह अंततः अपनी देह-रक्षा के लिए अपने सेवा-यंत्र पर निर्भर हो रहा है।
केंद्रीय संदर्भीय अर्थ
पद में शाऊल अपनी तलवार माँगते हैं ताकि वे अपने मृत्युवरण को अपने हथियार-ढोनेवाले के साथ कर दें, क्योंकि वे यह भय के कारण मानते हैं कि वे ठट्टा कर सकते हैं यदि वे नहीं मारते। इसका मकसद यह दिखाना है कि शाऊल किस हद तक प्रश्नों से भागने और आत्म-प्रयत्न के भरोसे पर निर्भर रहने लगे थे, बजाय परमेश्वर की योजना के पालन के।
तीन प्रमुख विषय
क्रॉस-रेफरेंसेज (संदर्भ) और संक्षिप्त प्रभाव
1) 1 शमूएल 28:7-20 — स्मरण: जब शाऊल मंत्रणा की कमी में एक विस्तृत अग्नि-युद्ध में फंसा था, तब परमेश्वर ने शाऊल के लिए संकेत नहीं दिया। यह दृष्टांत दिखाता है कि परमेश्वर के ऊपर भरोसा न रहने पर युद्ध के मैदान पर नेता कितने असहाय हो जाते हैं।
2) 2 शमूएल 1:1-16 — हलचल: दुष्ट-युद्ध के बाद, दुष्टों के परिणामस्वरूप शाऊल की मृत्यु की घटनाएं पुनः स्मरण कराती हैं कि किस प्रकार गलत निर्णय और भय-प्रधान दृष्टिकोण अंततः समाज पर दीर्घ प्रभाव डालते हैं।
3) भजन 27:14 — धैर्य और परमेश्वर पर भरोसा: इस पाठ से प्रेरणा मिलती है कि कठिन समय में भी आशा बनाए रखना चाहिए, न कि मृत्यु-आत्ण को seekना चाहिए।
व्यावहारिक विवेक
हम अपने जीवन में कभी-कभी ऐसे क्षण से गुजरते हैं जहाँ स्थिति अत्यंत आंशिक और असुरक्षित लगती है। गैर-उपायुक्त भय के बावजूद, इस पद से सीख मिलती है कि आत्म-रोधी के बजाय ईश्वर के मार्ग पर भरोसा रखना चाहिए। शाऊल की तरह आत्म-हत्याभाव के प्रश्न में नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण चुनना चाहिए, ताकि हमारी पहचान और नेतृत्व का सार स्पष्ट रहे।
संक्षिप्त निष्कर्ष
1 शमूएल 31:4 एक आखिरी आत्म-समर्पण की दास्तान नहीं, बल्कि एक स्पष्ट चेतावनी है कि भय और सेनाओं के समक्ष भी परमेश्वर के भरोसे को छोड़ना हमारे लिए कितना विनाशकारी हो सकता है। यह कथा हमें सिखाती है कि नेतृत्व में सही मार्ग वही है जो परमेश्वर के आदेशों के अनुरूप हो और जिसकी सहायता से हम भय के साए में भी विश्वास की लौ नहीं बुझने दें।
इसे समझाते समय हमारे विश्वसनीय प्रकाशकों के प्रकाश में देखना उपयोगी है: मैथ्यू हेनरी के अनुसार यह शाऊल की परमेश्वर-निष्ठा की कमी और घातक आत्म-नियंत्रण की विवशता को उजागर करता है; ऐल्बर्ट बार्न्स इसे स्थितियों के दायरे में मानवीय निर्बलता के प्रमाण के रूप में देखते हैं; adam क्लार्क इसे दैविक योजनाओं के विरुद्ध मनुष्यों की सुरक्षा-यंत्रणा का सूचक मानते हैं।