Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 राजाओं 3:1 2 राजाओं 3:2 2 राजाओं 3:3 2 राजाओं 3:4 2 राजाओं 3:5 2 राजाओं 3:6 2 राजाओं 3:7 2 राजाओं 3:8 2 राजाओं 3:9 2 राजाओं 3:10 2 राजाओं 3:11 2 राजाओं 3:12 2 राजाओं 3:13 2 राजाओं 3:14 2 राजाओं 3:15 2 राजाओं 3:16 2 राजाओं 3:17 2 राजाओं 3:18 2 राजाओं 3:19 2 राजाओं 3:20 2 राजाओं 3:21 2 राजाओं 3:22 2 राजाओं 3:23 2 राजाओं 3:24 2 राजाओं 3:25 2 राजाओं 3:26 2 राजाओं 3:27



2 राजा:3:3 - संदर्भ के साथ व्याख्या
पद का बूते के अनुसार यहाँ कहा गया है कि यह्रोराम के राजा यहोशाफ़ात के समय का असत्य और पापी इतिहास जुड़ा हुआ है: नबात के पुत्र यारोबाम के पापों के समानता और उनकी प्रतिपत्ति—यानी इस्राइल के पहाड़ों और शासकों की अशुद्धता—जो उन्हें परमेश्वर की साक्षात राह से दूर ले गई। इस पंक्ति में यह दर्शाया गया है कि उन्होंने यारोबाम के पापों की मिसाल दोहराई और परिणामस्वरूप पुनः न तो फिर इस्राएल ने पाप छोड़ने की राह पकड़ी, न ही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप शासन किया।
केंद्रीय अर्थ
यह Verse यह दिखाती है कि राजा का आचरण एक साम्राज्य के धार्मिक और नैतिक दिशा-निर्देशन को निर्धारित करता है। नबात के पुत्र यारोबाम के पापों से प्रेरित होकर यह राजा भी उन अशुद्धताओं को दोहराता है, अर्थात् राजाओं के व्यक्तिगत पापों का साम्राज्य की नीति और राज्याभिषेक पर गहरा प्रभाव पड़ता है। परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध दोहराए जाने वाले पाप एक जनसमुदाय के लिए विनाशकारी होते हैं और अंततः दायित्व-भरती हुई कड़ी जिम्मेदारियों के साथ आते हैं।
मुख्य विषय
संबद्ध अंश (Cross-references) और छोटा व्याख्या
1) संदर्भ: 2 राजाओं 14:6 — यह दिखाता है कि पापों के चक्र से छुटकारा कब संभव होता है, यदि जनता और नेतृत्व पछतावे और सुधार की राह में आ जाएं।
2) संदर्भ: 1 राजा 14:9 — यारोबाम के पापों का पूर्वापरक स्वरूप और ऐसे दोषों को व्यापक मान्यता मिलना किस प्रकार परिणाम लाता है।
3) संदर्भ: निम्नलिखित सामाजिक-धार्मिक प्रभाव: एक ही पथ पर चलना जनसमुदाय के विश्वास को प्रभावित करता है और धर्म-कर्म की सच्चाई को चुनौती देता है।
व्यावहारिक विचार
हमारे अपने जीवन में भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीकों से पाप की आदतें दोहरायी जाती हैं। प्रशासन, नेतृत्व, और व्यक्तिगत आचरण—तीनों क्षेत्रों में ईमानदारी, सत्य और पश्चाताप की नीति को अपनाकर ही चारों ओर शांति और सच्चे धर्म का निर्माण संभव है। इस प्रकार प्रेरणा मिलती है कि गलतियों को पहचानकर सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए, ताकि समुदाय और परिवार परमेश्वर की नज़र में सही मार्ग पर चलें।
संक्षिप्त समापन
इस verse में यह स्पष्ट होता है कि पापों की दोहराहट और धार्मिक-कथानक में हलचल न केवल राजा के जीवन को प्रभावित करती है, बल्कि पूरे इस्राइल के धार्मिक जीवन को भी जकड़ देती है। नतीजा यह है कि प्रशासन और पवित्रता के बीच संतुलन न बन पाने से परिणामस्वरूप दupyन्नामिया आ सकती है। प्रार्थना और सचेत सुधार के मार्ग से ही इस चक्र को रोका जा सकता है।
उद्धृत हो सकने वाले पारंपरिक टिप्पणीकारों के संकेत: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संक्षिप्त विचार आवश्यक स्थान पर उपयोग किए गए हैं।