Old Testament
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आमोस 3:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
“पृथ्वी के सारे कुलों में से मैंने केवल तुम्हीं पर मन लगाया है*, इस कारण मैं तुम्हारे सारे अधर्म के कामों का दण्ड दूँगा।
आमोस 3:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
आमोस 3:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
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व्यवस्थाविवरण 7:6 (HINIRV) »
क्योंकि तू अपने परमेश्वर यहोवा की पवित्र प्रजा है; यहोवा ने पृथ्वी भर के सब देशों के लोगों में से तुझको चुन लिया है कि तू उसकी प्रजा और निज भाग ठहरे।

निर्गमन 19:5 (HINIRV) »
इसलिए अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे; समस्त पृथ्वी तो मेरी है।

1 पतरस 4:17 (HINIRV) »
क्योंकि वह समय आ पहुँचा है, कि पहले परमेश्वर के लोगों का न्याय किया जाए, और जब कि न्याय का आरम्भ हम ही से होगा तो उनका क्या अन्त होगा जो परमेश्वर के सुसमाचार को नहीं मानते? (इब्रा. 12:24-25, यिर्म. 25:29, यहे. 9:6)
आमोस 3:2— केवल तुम्हीं पर मन लगा है
मुख्य interpretive बिंदु: परमेश्वर ने इस選 के साथ अपने चयन की निष्पत्ति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि पृथ्वी पर के सभी कुलों में से उन्होंने केवल इस選 को चुना है; इसका तात्पर्य यह है कि युग-युग की न्यायिक व्यवस्था में ईश्वर के चयन और दंड का संबंध कैसे चलता है। अहंकार या एहसान के बजाय, यह विशेष चयन उत्तरदायित्व और दायित्व के साथ आता है: अनुसरण न करने पर अधर्म के फल भी वहीँ गिरेगे। इस पद की कसौटी यह है कि परमेश्वर के चयन से ही उनकी योजना और न्याय का मार्ग बनता है; चयन के साथ दण्ड भी जुड़ता है।
काव्यात्मक संदर्भ और साहित्यिक ढांचा
आमोस की पुस्तक एक नबूती पुकार है जो इजराइल के सामाजिक और धार्मिक पतन पर केंद्रित है। इस वाक्य में निर्धारित किया गया है कि परमेश्वर ने एक विशेष समुदाय पर ही अपना प्रेम और पवित्र आशीष रखी, और उसी में से उल्लंघन के परिणाम भी उसी समुदाय पर लागू होते हैं। यह विशिष्ट चयन इंगीत करता है कि समाज के भीतर नैतिकता, न्याय और सच्चाई की कसौटी किन परिस्थितियों में लागू होगी।
theological significance
इस वचन में पाँच प्रमुख विचार उभरते हैं: (1) चयन के कारण दायित्व; (2) न्याय की अनिवार्यता; (3) सामुदायिक उत्तरदायित्व; (4) पाप की प्रकृति का प्रकाशन; और (5) परमेश्वर की क्रियाशीलता। इतिहास के इस मोड़ पर चयन का अर्थ एक कॉल है— जो समुदाय ईश्वर के रास्ते पर चलेगा, वही सुरक्षा और आशीष पाएगा; जो मुड़कर अपने तरीके से चलेगा, उसे दंड का सामना करना होगा।
आइडिया-लिंक: पवित्र उद्धरण और टिप्पणीकारों के संकेत
यहाँ उपलब्ध पारंपरिक टिप्पणीकारों की सहायता से संकलित विचार:
इनमें से यदि किसी के शब्द सीधे उद्धृत हों तो नीचे दिये गए स्पष्ट संकेत मिलेंगे: "स्थिति के अनुसार चयन और दंड साथ-साथ चलते हैं" (Henry), "लोक पर विशेष दायित्व" (Barnes), "न्याय-व्यवस्था सार्वभौम" (Clarke)—ये विचार सामंजस्यपूर्वक इस वाक्य की मसौदगी को मजबूत करते हैं।
cross-references (संयुक्त बोध के लिए छोटी-सी लिंक)
1) यूहन्ना 15:16— ईश्वर ने कहा कि उसने नहीं चुना, बल्कि चुना गया है ताकि फल बढ़े। यह चयन-आह्वान और दायित्व का संकेत देता है।
2) रोम 9:11-13— परमेश्वर की चुनाव-प्रकृति कैसे काम करती है, बिना मनुष्यों के प्रयत्नों के भी।
3) 5-Moses 7:6-8 (आदि): यह दर्शाता है कि कौन-सा समुदाय चुना गया और क्यों, ताकि वह मान-सम्मान और धैर्य की सीख पाए।
इन संदर्भों का उद्देश्य यह दिखाना है कि चयन और दंड का संचय पूर्णतया प्रभु-न्याय की एकीकृत योजना है, न कि व्यक्तिगत चुनाव का अविश्वासपूर्ण दुष्प्रयोग।
प्रश्न-चिन्ता के लिए विचार
संक्षिप्त निष्कर्ष
आमोस 3:2 एक स्पष्ट स्मरण देता है कि परमेश्वर के चयन—और उसी के साथ दायित्व—का संतुलन अनिवार्य है। यह सिर्फ पाठ के शब्द नहीं, बल्कि समुदाय-विकास की बुलाहट है: सच्चे न्याय के मार्ग पर चलना, सामाजिक अंधविश्वास और अन्याय से दूर रहना, और परमेश्वर की योजना के अनुरूप आचरण का पुनर्निर्माण करना।