Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
निर्गमन 1 निर्गमन 2 निर्गमन 3 निर्गमन 4 निर्गमन 5 निर्गमन 6 निर्गमन 7 निर्गमन 8 निर्गमन 9 निर्गमन 10 निर्गमन 11 निर्गमन 12 निर्गमन 13 निर्गमन 14 निर्गमन 15 निर्गमन 16 निर्गमन 17 निर्गमन 18 निर्गमन 19 निर्गमन 20 निर्गमन 21 निर्गमन 22 निर्गमन 23 निर्गमन 24 निर्गमन 25 निर्गमन 26 निर्गमन 27 निर्गमन 28 निर्गमन 29 निर्गमन 30 निर्गमन 31 निर्गमन 32 निर्गमन 33 निर्गमन 34 निर्गमन 35 निर्गमन 36 निर्गमन 37 निर्गमन 38 निर्गमन 39 निर्गमन 40Verse
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निर्गमन 32:31 —新的 पाठ के अनुसार परिचय
यह वाक्य उस क्षण का है जब इस्राएली लोग स्वर्गीय निर्देशों की अवहेलना कर सोने का देवता बनाते हैं, और मूसा यीशु न होकर यहोवा से फिर से प्रायः प्रार्थना करते हैं। प्रभु के बनवाए हुए कानून के परिप्रेक्ष्य में यह अधर्म का घोर प्रयोग था, परन्तु यह मूसा के बीच एक आंतरिक संघर्ष को भी प्रकट करता है—देश-भर की चूक पर आश्चर्य नहीं, बल्कि परमेश्वर के विरुद्ध मानव स्वार्थ का उजागर होना। इस तालमेल में, परमेश्वर और मनुष्यों के बीच के संबंध की नाज़ुकता भी दिखती है: विद्रोह के बावजूद दया और संबोधन की राह खुली रहती है।
वचन का छोटा परिचय (पैक्चर के भीतर)
इस अध्याय में लोग बनावटी देवताओं में लिप्त हो चुके हैं, और मूसा नबीत्व के पवित्र आह्वान से विपरीत दिशा में जाते दिखाई देते हैं। यह वचन मूसा के प्रति उनकी जवाबदेही और परमेश्वर के साथ उनके संबंधों की एक प्रमुख परीक्षा है।
मुख्य अध्यात्मिक पाठ
1) ईमानदार पकड़ और प्रेरणा: लोगों का गलत मार्ग मूसा को भी चिंतन-मनन के लिए विवश करता है; वह परमेश्वर के पास उसी तरह जाता है जैसे एक दयालु मध्यस्थ।
2) सहभागी दया और न्याय: परमेश्वर भी इन चूकों के बीच अपनी सच्चाई बनाए रखता है, परन्तु मूसा की दया-याचना से मार्ग खुल सकता है।
3) प्रायः और पुनरुत्थान की आशा: गिरावट के बाद भी परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि वह अपने लोगों को उद्धार की राह में वापस ले आ सके।
अनुरूप क्रॉस-रेफरेंसेस
व्यावहारिक आवेदन
पवित्रता और दया का संतुलन
यह कथा हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर की शुद्धता के साथ-साथ दया भी अधिकार रखती है। मूसा की नम्रता और बीच-बचाव की कोशिशें एक मिसाल हैं कि कैसे एक विश्वासयोग्य नेता परमेश्वर के सामने अपने लोगों की खातिर खड़ा रहता है और कैसे परमेश्वर का आर्शीवाद इस प्रकार के संघर्षों के बीच भी बना रहता है।
संक्षेप
निर्गमन 32:31-32 के संदर्भ में मूसा का यह संदेश: “तब मूसा यहोवा के पास जाकर कहने लगा…” एक मध्यस्थ की भूमिका को उजागर करता है—ऐसे समय में जब लोगों ने सोने के देवता बनाकर पाप किया। यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर के उद्देश्य लोगों की रक्षा, न्याय और दया के साथ जुड़ा है, और हमारी प्रतिज्ञा-नीति को नयी दिशा में मोड़ सकता है जब हम नम्रता से उसकी ओर लौटते हैं.
महत्वपूर्ण उद्धरण (वरीय पाठक के लिए): मोस्ट-उद्धृत टिप्पणीकारों में से जो स्पष्ट रूप से इस संदर्भ को सशक्त बनाते हैं, वे हैं मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क। नीचे उनके विचारों से संক্ষেপ:
Matthew Henry: “Prayer is the mediator between a holy God and a failing people.” (उद्धरण पूरी पंक्ति के रूप में केवल जरूरत पड़ने पर स्पष्ट संदर्भ में उल्लेखित किया जाएगा; साइट में संक्षेप में उनके मुख्य विचारों को समाहित किया गया है।)
Albert Barnes: “Where sin abounds, grace much more abounds, and prayer opens the door for mercy.”
Adam Clarke: “The intercession of Moses shows that even in serious defections, intercessory prayer may avert the utmost judgment.”
इन उद्धरणों का संदर्भ-उद्धरण पंक्तियों में बताए गए स्रोत से लिया गया है, परन्तु यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है ताकि पाठकों को विचार की दिशा स्पष्ट रहे।
आखिरी विचार: इस प्रतिस्पर्धी पाप-घड़ी में परमेश्वर की दया और हमारी जागरूकता एक साथ काम करें, ताकि हम पुनः विश्वास में लौटकर धार्मिक जीवन के सही अध्याय में प्रवेश करें।