उत्पत्ति 19:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

जब पौ फटने लगी, तब दूतों ने लूत से जल्दी करने को कहा और बोले, “उठ, अपनी पत्‍नी और दोनों बेटियों को जो यहाँ हैं ले जा: नहीं तो तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाएगा।”

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उत्पत्ति 19:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

उत्पत्ति 19:15 — पवित्र नगर से भागना और प्राथमिक चेतावनी

सीधी मायने पौ फटने से पहले दूत लूत को वहा से भागने के लिये कहते हैं, ताकि नगर के अधर्म के कारण हर चीज़ नष्ट न हो जाए। वे अब भी लूत और उसकी परिवार के कुछ लोगों को सुरक्षित स्थल तक ले जाने की अग्रिम चेतावनी देते हैं।

पार्श्वभूमि और संदर्भ

सदोम और अमोरा के नगरों में पाप की गहराई बढ़ चुकी थी, और दूतों के आगमन के पीछे ईश्वर का हरकतमय निर्णय स्पष्ट दिखता है। लूत ने अपने घर वालों को बचाने के लिये त्वरित निर्णय लिया, परन्तु नगर की अन्य जनता ने इस संदेश को उपहास किया। यह अंश तब आता है जब दूत लूत को शहर छोड़ने की दिशा देते हैं ताकि विनाश से बच सके।

व्याख्यात्मक बिंदु

  • भागने का आग्रह: दूतों की आज्ञा जीवनधारी है—विश्वासयोग्य सुरक्षा तब मिलती है जब परमेश्वर की सलाह के अनुसार कदम उठाए जाएँ।
  • परिवार की भूमिका: लूत से कहा गया है कि वह अपनी पत्नी और दोनों बेटियों के साथ चले, जिससे परिवार-सम्पर्क और सुरक्षित निकास का महत्व उभरकर आता है।
  • निश्कर्ष और दायित्व: नगर के अधर्म के कारण विनाश निश्चित है; चेतावनी के बावजूद भी चयन का दायित्व प्रत्येक व्यक्ति के ऊपर है।

मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बर्न्स, एडम क्लार्क से संक्षिप्त विचार

हेनरी के अनुसार यह तथ्य उद्घाटित करता है कि परमेश्वर की न्याय-चेष्टा में निर्दोषों की सुरक्षा का निवास समाहित है, परन्तु यह भी स्पष्ट है कि परमेश्वर का आदेश मानना आवश्यक है। “God's compassion towards the righteous mixed with the severities of his judgments shows the balance of divine governance.” (इसी प्रकार के विचार उनकी टिप्पणी में मिलते हैं।)

बर्न्स का दृष्टिकोण बताता है कि यह भागना एक दृढ़ निश्चय की प्रक्रिया है और अविश्वासी सोच से नहीं; दूतों की आवाज़ तुरंत प्रतिक्रिया की माँग करती है।

क्लार्क कहते हैं कि लूत को चेतावनी देते समय नगर के अधर्म की गहराई और दूतों का क्रोध-व्यवहार एक साथ दिखता है; यह पाठक को यह याद दिलाता है कि दया और न्याय दोनों साथ-साथ चलते हैं।

छोटे थीम आधारित निष्कर्ष

  1. ईश्वर की महिमा के लिये पलायन की उनकी आज्ञा के प्रति अनुशासन।
  2. परिवारिक दायित्व और सुरक्षा के महत्व की चेतावनी।
  3. अधर्म के बीच से बचने के लिए तुरंत आचरण की आवश्यकता।

अनुष्ठानिक क्रॉस-रेफरेंसेस (संदर्भ) और उनका संक्षेप

1) उत्पत्ति 18:20-21 — समाज में अन्याय की गहराई और परमेश्वर की न्याय-प्रणाली की पुष्टि।

2) उत्पत्ति 19:26 — “जो पीछे देखा वह बूढ़ी नगर की यातना से बच नहीं पाया”; इस से निकासी की गंभीरता स्पष्ट होती है।

3) गलतफहमी के विरुद्ध सच्चा विश्वास: जब दूत चेतावनी देते हैं, तब निर्णय व्यक्तियों पर निर्भर रहता है—आस्था के साथ भागना ही जीवन बचाने का मार्ग है।

व्यावहारिक takeaway

ईश्वर की चेतावनियाँ कभी-कभी कठोर लग सकती हैं, पर उनका उद्देश्य सुरक्षा और आशीर्वाद है। कठिन परिस्थिति में सीधे कदम उठाकर ही सुरक्षित मार्ग प्राप्त होता है। परिवार के साथ परमेश्वर की योजना पर भरोसा रखें और अक्षम्य कलह में नहीं फँसे रहें।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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“मण्डली के लोगों से कह कि कोरह, दातान, और अबीराम के तम्बूओं के आस-पास से हट जाओ।”

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फिर मैंने स्वर्ग से एक और शब्द सुना, “हे मेरे लोगों, उसमें से निकल आओ* कि तुम उसके पापों में भागी न हो, और उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर आ न पड़े; (यशा. 52:11, यिर्म. 50:8, यिर्म. 51:45)

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फुर्ती से वहाँ भाग जा; क्योंकि जब तक तू वहाँ न पहुँचे तब तक मैं कुछ न कर सकूँगा।” इसी कारण उस नगर का नाम सोअर पड़ा।

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