उत्पत्ति 19:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

उसने उससे कहा, “देख, मैंने इस विषय में भी तेरी विनती स्वीकार की है, कि जिस नगर की चर्चा तूने की है, उसको मैं नाश न करूँगा।

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उत्पत्ति 19:21 पद-दर-पद बाइबल टीका

मुख्य व्याख्यात्मक बिंदु

उत्पत्ति 19:21 में परमेश्वर का दृष्टिकोण करुणा और न्याय के बीच संतुलन को दर्शाता है: वह अब्राहम की याचना को स्वीकार कर रहा है और दया के अनुरूप लोः के निवासियों के लिए दण्ड में सीमा रख रहा है, परन्तु पाप के कारण न्याय क्रियान्वित होना अभी भी अनिवार्य है।

साहित्यिक प्रसंग

यह पद उस संवाद का हिस्सा है जिसमें अब्राहम ने परमेश्वर से सोगोमोर और गोमोरrah के लिये क्षमा माँगी थी। पहले अब्राहम ने पचास धर्मियों की उपस्थिति पर भी नगर नष्ट न करने का निवेदन किया; बातचीत क्रमशः घटकर दस तक पहुँची। 19:21 परमेश्वर का उत्तर है कि अब्राहम की याचना को स्वीकार कर दिया गया है और वह यदि पापियों की संख्या दस भी हो तो नगर नाश न किया जाएगा। यहाँ नाटकीयता इस बात में है कि दया की सीमा स्थापित की जा रही है—परन्तु कहानी में आगे की घटनाएँ दर्शाती हैं कि उस दया की वास्तविक परीक्षा कहाँ हुई।

वैचारिक और धार्मिक महत्व

यह पद दो महत्वपूर्ण धार्मिक सिद्धातों पर प्रकाश डालता है:

  • परमेश्वर का न्याय और दया सहअस्तित्व रखते हैं — वह पाप पर प्रतिक्रिया करता है, पर दया की गुंजाइश भी रखता है।
  • इंटरसीसरी प्रार्थना (मध्यस्थता) प्रभावी हो सकती है; अब्राहम की बिनती ने परमेश्वर के निर्णय को बदलने जैसा प्रभाव दर्शाया।

यह पाठ पाठक को याद दिलाता है कि ईश्वर का स्वरूप मात्र कठोर नहि बल्कि दयालु भी है, पर उसके समीकरण में पाप का गंभीर परिणाम भी शामिल है।

शास्त्रों में सम्बन्ध (Cross-references)

व्यापक बाइबिलिक संदर्भों में यह पद निम्नलिखित स्थानों से सहप्रकाश प्राप्त करता है:

  • पुनरावृत्ति 32:4 — परमेश्वर के न्याय और निष्पक्षता के बारे में, जो इस कथन के न्याय-आधार को पुष्ट करता है।
  • यशायाह 1:18–20 — द्वैत: पश्चाताप पर छूट और अस्वीकृति के परिणाम; यह पाठ परमेश्वर के क्षमाशील-परन्तु निर्णायक स्वभाव को प्रतिध्वनित करता है।
  • याकूब 5:16 — सबल मध्यस्थ प्रार्थना का प्रभाव; अब्राहम की निवेदनात्मक मिन्नतें पूरे मंच पर मध्यस्थता की भूमिका दिखाती हैं।

प्रतिबिंबनीय प्रश्न

कुछ विचार करने योग्य प्रश्न:

  • हमारे लिये परमेश्वर की दया और न्याय का संतुलन कैसे लागू होता है?
  • क्या हमारी मध्यस्थ प्रार्थनाएं दूसरों के लिये परिवर्तन लाने में वास्तविक प्रभाव रखती हैं?
  • जब हम भ्रष्ट समाज देखते हैं, तब हम दया और न्याय में किस तरह का दृष्टिकोण अपनाएँ?

मिथकीय टिप्पणीकारों की संक्षिप्त सूचना

मैथ्यू हेनरी ने इस प्रकार की मध्यस्थता को महत्व दिया और लिखा है कि एक सच्ची याचना में दूसरों के लिए सहानुभूति और परोपकार का समावेश होता है (मैथ्यू हेनरी का पैराफ्रेज़ अनुकरणीय)। अल्बर्ट बार्न्स ने भी इस संवाद को ईश्वर की सहमति और मनाने के तरीके के रूप में देखा, परन्तु उसने स्पष्ट किया कि परमेश्वर की दया स्वेच्छा और न्याय के भीतर काम करती है। आदम क्लार्क ने पाप और दण्ड के आवश्यकता-तत्त्व पर प्रकाश डाला। (इन तीनों से एक-या-दो वाक्यांशों के सटीक उद्धरण इस टिप्पणी में सम्मिलित नहीं किए गए हैं।)

सारांश और व्याख्या

उत्पत्ति 19:21 हमें सिखाता है कि ईश्वर परोक्षतः मनुष्यों की दया-पूर्ण याचनाओं का उत्तर देता है परन्तु उसके न्याय के नियम भी कायम रहते हैं। अब्राहम की मधुर विनती ने परमेश्वर के कदम में दया की सीमा रख दी, परन्तु आगे की कथा दर्शाती है कि व्यक्तिगत पाप और समाजिक दुष्टता के परिणाम से बचना हमेशा संभव नहीं होता। पाठक के लिये यह चुनौती है कि वह स्वयं की दया, मध्यस्थता और पाप के प्रति ग्रहणशीलता की परीक्षा करे—और समझे कि दया का अर्थ बिना पश्चाताप के अनुग्रह नहीं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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