Old Testament
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हबक्कूक 1:16 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इसलिए वह अपने जाल के सामने बलि चढ़ाता और अपने महाजाल के आगे धूप जलाता है; क्योंकि इन्हीं के द्वारा उसका भाग पुष्ट होता, और उसका भोजन चिकना होता है।
हबक्कूक 1:16 पद-दर-पद बाइबल टीका
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हबक्कूक 1:16 समानांतर पद और संबंधित वचन
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हबक्कूक 1:11 (HINIRV) »
तब वे वायु के समान चलते और मर्यादा छोड़कर दोषी ठहरते हैं, क्योंकि उनका बल ही उनका देवता है।

व्यवस्थाविवरण 8:17 (HINIRV) »
और कहीं ऐसा न हो कि तू सोचने लगे, कि यह सम्पत्ति मेरे ही सामर्थ्य और मेरे ही भुजबल से मुझे प्राप्त हुई।

यशायाह 37:24 (HINIRV) »
अपने कर्मचारियों के द्वारा तूने प्रभु की निन्दा करके कहा है कि बहुत से रथ लेकर मैं पर्वतों की चोटियों पर वरन् लबानोन के बीच तक चढ़ आया हूँ; मैं उसके ऊँचे-ऊँचे देवदारों और अच्छे-अच्छे सनौबरों को काट डालूँगा और उसके दूर-दूर के ऊँचे स्थानों में और उसके वन की फलदाई बारियों में प्रवेश करूँगा।
हबक्कूक 1:16 पर टिप्पणी: जात मत के पीछे धनी-उद्धार का जाल
मुख्य interpretive point: यहाँ लिखा गया है कि आसपास की जनता अपनी अधर्मपूर्ण उपार्जन के लिए बलि-बल और धूप-दीप से ही भोजन की तुष्टि खोजती है, भले ही यह अहंकारी स्वार्थ और अन्यायपूर्ण लाभ के माध्यम से हो। भविष्यवक्ता हबक्कूक यह बताता है कि शॉखिमार, जो अंधे भाग्य के साथ अपने शक्तिशाली जाल बनाते हैं, दरअसल अपने भाग्य को ही अपना देवता बनाते हैं; उनके मार्ग से नहीं, बल्कि उनके पथ के परिणाम से ही उनका भाग पुष्ट होता है। यह वाक्य मानव स्वभाव के सच को उजागर करता है— लोभ और त्रुटिपूर्ण आस्था कैसे एक ही समय में आनंद और अदम्य असंतुष्टि पैदा करते हैं।
1) सन्दर्भ-कथा और साहित्यिक संरचना
यह अंश हबक्कूक की पुस्तक में बंधी एक कठोर दार्शनिक चाच है: जब दोषपूर्ण अस्थिर शासन और अन्यायपूर्ण व्यवस्था से लोग लाभ उठाते हैं, तो वे देव-स्वरूप का दावा कैसे करते हैं। जाल और धूप, यहाँ प्रतीक के रूप में, वे उपाय दर्शाते हैं जिनसे धार्मिक कर्मों के नाम पर सामर्थ्य और उपलब्धि प्राप्त होती है—पर यह सब भ्रष्ट लाभों के लिए प्रयोग होते हैं। यह कविता-भाषा अकसर दार्शनिक अंधकार को उजागर करती है, जिसमें मूर्तिपूजा और असत्यान्वेषा एक साथ चलते हैं।
2) theological significance
हबक्कूक यह स्पष्ट कर देता है कि ईश्वर के न्याय के सामने लोगों की आस्था कभी-कभी उनके स्वयं के लाभ के संरचना से विकृत हो जाती है। जब लोग अपने जालों से भोजन बनाते हैं, तब वे ईश्वर के नियमों की परवाह कम और अपने लाभ की चाह अधिक करते हैं। इसमें सामाजिक-उच्च-न्याय के विरुद्ध एक चेतावनी है: अधर्मपूर्ण साधनों से प्राप्त संपदा एक क्षण में पुष्ट हो सकती है, पर वह दीर्घकालिक सुरक्षित भोजन नहीं बनती। यह वही बात है जो अन्य स्थानों में भी आती है— धार्मिक कर्म के नाम पर भ्रष्टाचार और छल से मिलने वाला लाभ अंततः नष्ट हो जाता है, क्योंकि ईश्वर की योजना सत्य और न्याय पर टिकती है।
3) cross-references (संक्षिप्त सम्वेदना)
हर संदर्भ में यह स्पष्ट रहता है कि बाहरी धर्म-क्रिया से आंतरिक परिवर्तन अधिक महत्वपूर्ण है; भीतरी ईमानदारी और न्याय की धार के बिना धन्यवाद-घटित धर्म केवल खाली ध्वनि है।
4) reflection questions (विचार-विमर्श के प्रश्न)
5) concise conclusion
यह पद हमें स्मरण कराता है कि अभिमन्यता के जाल से भोजन बनाना अस्थाई है; वास्तविक आहार वही है जो ईश्वर की इच्छा और न्याय के अनुसार जीवन को संजोए। जब मनुष्य अपनी कमाई और उपक्रमों में देव-आस्था के लिए जगह बनाते हैं, तब तक परमेश्वर की सच्ची इच्छा—न्याय और दयालुता—कायम रहती है।
पद के बारे में उद्धृत मध्य-आलोचना (आमतौर पर प्रकाशित पुरानी टीका के छोटे उद्धरण)
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-domain टिप्पणियों में इस प्रकार के विचार मिलते हैं: वे आस्तिक-छूट और भ्रष्ट साधनों के भीतर रहने वाले मनुष्यों के जोखिमों पर जोर देते हैं—कि बाह्य कर्म से भीतर परिवर्तन नहीं होता। विशेष टिप्पणी के स्वर उनके अनुसार यह है कि धर्म के नाम पर जाल और धूप संचालन, न केवल निष्प्रयोजन है, बल्कि ईश्वर के आदर्शों के विपरीत है। ध्यान दें: यहाँ पर कोई पूर्ण उद्धरण नहीं दिया गया है, बल्कि उनका समेकित विवेचन संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है।