Old Testament
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हबक्कूक 1:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तू मुझे अनर्थ काम क्यों दिखाता है? और क्या कारण है कि तू उत्पात को देखता ही रहता है? मेरे सामने लूट-पाट और उपद्रव होते रहते हैं; और झगड़ा हुआ करता है और वाद-विवाद बढ़ता जाता है।
हबक्कूक 1:3 पद-दर-पद बाइबल टीका
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हबक्कूक 1:3 समानांतर पद और संबंधित वचन
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भजन संहिता 55:9 (HINIRV) »
हे प्रभु, उनका सत्यानाश कर, और उनकी भाषा में गड़बड़ी डाल दे; क्योंकि मैंने नगर में उपद्रव और झगड़ा देखा है।

यिर्मयाह 9:2 (HINIRV) »
भला होता कि मुझे जंगल में बटोहियों का कोई टिकाव मिलता कि मैं अपने लोगों को छोड़कर वहीं चला जाता! क्योंकि वे सब व्यभिचारी हैं, वे विश्वासघातियों का समाज हैं।

सभोपदेशक 5:8 (HINIRV) »
यदि तू किसी प्रान्त में निर्धनों पर अंधेर और न्याय और धर्म को बिगड़ता देखे, तो इससे चकित न होना; क्योंकि एक अधिकारी से बड़ा दूसरा रहता है जिसे इन बातों की सुधि रहती है, और उनसे भी और अधिक बड़े रहते हैं।
हबक्कूक 1:3 का व्याख्यात्मक बोध: क्यों दिखता है अनर्थ और उत्पात?
मुख्य व्याख्या बिंदु: इस Verse में भविष्यद्वक्ता हबक्कूक अपने समय की तीखी असमानताओं को दृष्टिगोचर कर परमेश्वर से स्पष्ट शिकायत कर रहा है—क्यों वह अनर्थ, लूट, झगड़े और वाद-विवाद को स्थिर देखने को देता है? यह कठिन प्रश्न भले ही दैवीय न्याय के परिप्रेक्ष्य में आता है, पर इसका उद्देश्य विश्वासी को धैर्य, ईमानदार प्रश्न और परमेश्वरीय पैटर्न के साथ सामना करने के लिये प्रेरित करना है: भले वर्तमान स्थिति असुदृढ़ और उलझनपूर्ण हो, परमेश्वर के अधिनियम का अंतःस्थापित उद्देश्य उसी योजना का भाग है। हबक्कूक अपने आस्था के एक कठोर क्षण में भी यह स्वीकार करता है कि प्रभु की राहें मानवीय समझ से परे हो सकती हैं; फिर भी वह परमेश्वर की सत्ता, न्याय और कृपा पर भरोसा बनाए रखने की मानसिक सेतु बनाता है।
पाठ-संदर्भ (साहित्यिक पृष्ठभूमि)
हबक्कूक के पठन में तीन प्रमुख तत्व उभरते हैं: (1) नबी का ईमानदार प्रश्नवाचक संवाद—क्यों उत्पात और हिंसा निरंतर दिखाई देती है? (2) दैवीय प्रत्युत्तर का संकेत—प्रभु कह रहे हैं कि वह उत्तरदायित्व के साथ क्रोध और न्याय की योजना रखता है, जो कभी तुरंत नहीं परन्तु समयानुसार पूरी होगी। (3) नबी-आत्मा में बने धैर्य की माँग—विश्वास तब परखा जाता है जब दृश्य असमानता को देखकर मन उद्वेलित हो, परर्धार्मिकता से बंधा रहता है।
तेहखानी और theological significance
हबक्कूक 1:3 में एक तीखे प्रश्न के साथ नबी अपने इतिहास-परिदृश्य को देख कर कहता है कि क्रूर overtakes और अराजकता कैसे चलती है—यह एक न्यायगत धर्मग्रंथ की वास्तविकता है: परमेश्वर अपने लोगों के लिए न्याय करेंगे, पर यह प्रक्रिया कब और कैसे होगी, यह नबी को अभी स्पष्ट नहीं दिखता। इस पाठ से यह विचार उभरता है कि विश्वास की राह में कठिन परिस्थितियाँ इंसानी कारण-जानकारी से परे दैवीय योजनाओं के अधीन होती हैं; फिर भी आस्था रहनी चाहिए। जड़ नियम यही है: परमेश्वर के काल-निर्देशों के भीतर भी कल्याण की दिशा बनती है, भले वह हमारी वही समझ से पूर्णतः परे हो।
पूर्ववर्ती और पारस्परिक संदर्भ
यहां 1:3 से जुड़ी कुछ cross-references हैं जो पाठ की गहराई समझाने में सहायक हैं: - मार्गदर्शक प्रश्नों के साथ विश्वास बनाये रखना: इब्रानियों 10:23 के संदर्भ में कहते हैं, दृढ़ विश्वास के साथ आशा को स्थिर रखें क्योंकि वह जो क़दम उठाता है, वह सत्यापित होगा। - न्याय और समय: रोमियों 12:19-21 में कहा गया है कि हमें नष्ट करने से ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए; परंतु बुराई का प्रतिफल समय पर अवश्य आता है। - परमेश्वर की योजना में धैर्य: इसके समान प्रेरितों के काम 1:7 में कहा गया कि समय-समय पर केवल पिता का विधान है, इसलिए हमारे लिये धैर्य आवश्यक है।
विचारप्रिय प्रश्न
निष्कर्ष (संक्षिप्त)
हबक्कूक 1:3 हमें एक सच्चे विश्वास की भूमिका समझाता है—कि कठिन समय में भी ईश्वर के प्रति ईमानदारी से प्रश्न उठाने की अनुमति है, और वह प्रतिक्रिया के समुचित समय में न्याय और चंगाई लाने वाला है। नबी की वास्तविकता यही है कि प्रश्न करते हुए भी वह परमेश्वर की सत्ता, करुणा और वचनों के अनुरूप चुपचाप भरोसा बनाए रखता है। जीवन के उथल-पुथल में भी प्रभु की नीति-नियति पर भरोसा रखना ही विश्वास की ठोस कसौटी है।
उद्धरण-नोट: इस पाठ के भीतर Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke जैसी पब्लिक-डोमेन टिप्पणीकारों के सीधे संकथन esenciales उद्धृत नहीं किये गए हैं; यदि आप चाहें तो मैं उनके छोटे-छोटे सारांश-उद्धरण आपकी जरूरत के अनुसार संक्षेप में दे सकता/सकती हूँ।