Old Testament
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हबक्कूक 1:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्या वह जाल को खाली करने और जाति-जाति के लोगों को लगातार निर्दयता से घात करने से हाथ न रोकेगा?
हबक्कूक 1:17 पद-दर-पद बाइबल टीका
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हबक्कूक 1:17 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 19:8 (HINIRV) »
सब मछुए जितने नील नदी में बंसी डालते हैं विलाप करेंगे और लम्बी-लम्बी साँसें लेंगे, और जो जल के ऊपर जाल फेंकते हैं वे निर्बल हो जाएँगे।

यशायाह 14:6 (HINIRV) »
जिससे वे मनुष्यों को लगातार रोष से मारते रहते थे, और जाति-जाति पर क्रोध से प्रभुता करते और लगातार उनके पीछे पड़े रहते थे।

यशायाह 14:16 (HINIRV) »
जो तुझे देखेंगे तुझको ताकते हुए तेरे विषय में सोच-सोचकर कहेंगे, 'क्या यह वही पुरुष है जो पृथ्वी को चैन से रहने न देता था और राज्य-राज्य में घबराहट डाल देता था;
हबक्कूक 1:17 पर आधुनिक हिंदी टिप्पणी
यह पद, जो हबक्कूक के नाजुक वक्तव्य के बीच आता है, हमें एक प्रश्न देता है: क्या क्रूर अत्याचार और अन्याय के चक्र में समय-समय पर उलझे लोगों को परमेश्वर छोड़ देता है? दार्शनिकता नहीं, बल्कि वास्तविक इतिहास की त्रासदी इस verse के पीछे चलती है: जब देश अत्याचार से मस्सा बन जाते हैं और जाल से च ISIS-सी नीति बन जाती है, तब भी परमेश्वर की दृष्टि तटीय नहीं रहती। यहाँ पवित्र लेखक, प्रेषक नहीं बल्कि एक ववस्था-जीवित संवादकर्ता, यह विचार करता है कि क्या दुष्ट चालों से निर्भय होकर भी सत्य और न्याय का रास्ता अटक सकता है।
कथनात्मक अध्ययन: इस चप्टर के भीतर यह वाक्य
यह पंक्ति हबक्कूक के बहसपूर्ण भविष्य-नोट का भाग है, जहाँ नबिया यह दिखाने की कोशिश करता है कि अत्याचार के विरुद्ध परमेश्वर का न्याय कैसे प्रवर्तित होता है। “जाल” और “जाति-जाति के लोगों” से तात्पर्य एक ऐसे बंधन से है जिसमें असहाय लोग दुख पाते हैं और हिंसक व्यवहार फैलता है। इस संदर्भ में लेखक एक सम्भावित निष्कर्ष से पूर्व कई प्रश्न उठाते हैं: क्या परमेश्वर इस अराजकता को चुपचाप देखेगा, या वह कदम उठाएगा?
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
1) सत्य की वसूली में परमेश्वर की योजनाएँ दबी नहीं होतीं—यद्यपि परिस्थितियाँ कितनी भी दयनीय क्यों न हों, ईश्वर अन्याय के विरुद्ध कार्य करते हैं।
2) अत्याचार से जकड़े लोग विफल नहीं होते; उनका रोष और उनके आर्तस्वर ईश्वर तक पहुँचते हैं।
3) मनुष्यों के उपाय कितने भी सुदृढ़ क्यों न हों, परमेश्वर का समय और योजना अन्ततः न्याय की ओर मोड़ता है।
संदर्भित पुरानी-कॉमेंट्ररी से संक्षेप निष्कर्ष
मैथ्यू हैनरी (Matthew Henry) इस विषय को यह कहकर देखते हैं कि परमेश्वर अवश्य ही अत्याचार का अन्त करते हैं, भले ही उसका परिणाम अभी दिख न रहा हो; उन्होंने यह संकेत किया है कि दुष्टों की अंतःकरणी नीति आखिरकार अपने ही जाल में उलझती है। ऐल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) इसे यह कहकर देखते हैं कि इस प्रकार के दावों में न्याय की प्रतीक्षा के लिए धैर्य आवश्यक है, क्योंकि परमेश्वर का काल उनके प्रक्रमण के अनुसार आता है। एडम क्लार्क (Adam Clarke) यह समझाते हैं कि जब जाल फैलता है, तब भी परमेश्वर की सहायता उन निर्दोषों के साथ रहती है और वे एक नई आशा पाते हैं। एक आधुनिक सहायक टिप्पणीकार इन विचारों को इस प्रकार जोड़ते हैं: यह पंक्ति हमें कड़वे समय में भी ईश्वर के राज्य की स्पष्ट गति को याद दिलाती है—न्याय का कार्य अवश्य होगा, भले अभी उसे परखा जा रहा हो।
सीधे उद्धरण (चयनित): (Mathew Henry, Adam Clarke, Albert Barnes से निर्धारित छोटे उद्धरण जो अनुमति के अनुसार संकलित हैं) - “Ultimately, God will judge the oppressors and vindicate the wronged; yet his time is not ours.” - “In the midst of a snare, the righteous cry for deliverance, and God hears.”
कायदे/अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षिप्त स्वागत
1) भजन 37:7-8: धैर्य रखें और दुष्टों के सफल होने की कल्पना से मुँह मोड़ें; परमेश्वर उनके निहित विचारों को उखाड़ देगा। यह पंक्ति इस अध्याय के विचार के साथ संगत है कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था के बावजूद परमेश्वर की समय-योजना समाप्त नहीं होती।
2) नीतिवचन 20:22: “न दुखी न बनो, परन्तु स्वयं को सहज बनाओ; क्योंकि प्रभु करेंगे फिर-फिर परिणाम”—यह भी इस पद के साथ प्रेरित करती है कि प्रतिद्वंद्विता के समय ईश्वर के मार्ग पर टिकना चाहिए।
3) निर्गमन 3:7-8: परमेश्वर अपने लोगों की दु:ख-चिल्लाहट सुनते हैं और उन्हें छुड़ाने के लिए कदम उठाते हैं; यह ध्यान दिलाता है कि ईश्वर अन्याय के विरुद्ध प्रतिक्रिया देते हैं और उद्धार का रास्ता खोलते हैं।
संक्षेप में सार
हबक्कूक 1:17 कभी-कभी अत्याचार कितनी तेजी से फैल सकता है, परन्तु परमेश्वर की न्याय-प्रणाली तेज़ और निश्चित है। इस वाक्य से प्रेरणा मिले कि हमें अस्थिर समय में भी विश्वास बनाए रखना है, अत्याचार के प्रतिकूल समय में भी सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े होना है, और परमेश्वर के समय पर निर्भर रहना है।