Old Testament
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होशे 12:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
वह दूत से लड़ा, और जीत भी गया, वह रोया और उसने गिड़गिड़ाकर विनती की। बेतेल में वह उसको मिला, और वहीं उसने हम से बातें की।
होशे 12:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 12:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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उत्पत्ति 32:29 (HINIRV) »
याकूब ने कहा, “मैं विनती करता हूँ, मुझे अपना नाम बता।” उसने कहा, “तू मेरा नाम क्यों पूछता है?” तब उसने उसको वहीं आशीर्वाद दिया।

उत्पत्ति 32:9 (HINIRV) »
फिर याकूब ने कहा, “हे यहोवा, हे मेरे दादा अब्राहम के परमेश्वर, हे मेरे पिता इसहाक के परमेश्वर, तूने तो मुझसे कहा था कि अपने देश और जन्म-भूमि में लौट जा, और मैं तेरी भलाई करूँगा:

होशे 12:4 पर दृष्टि: दूत से संघर्ष और विनय
सीधे शब्दों में इसका अर्थ है: वह व्यक्ति जिसने दूत से संघर्ष किया और अंततः विनम्रता से विनती की; बेतेल (याकूब) में वही दूत उससे बातें कर रहा था। यह आयत याकूब की आध्यात्मिक आत्म-चेतना और परमेश्वर के प्रति उसकी बदलती दृष्टि को दिखाती है: समर्थन पाने के लिए संघर्ष भी हो सकता है, परन्तु विवेकपूर्ण विनय से परमेश्वर की उपस्थिति में फिर से प्रवेश होता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
होशे की पुस्तक में ईश्वर के प्रति फिरौती-प्रणालियों और आस्थागत ढीलेपन के बीच एक बारम्बार चेतावनी है कि इस्राएल अपने पथ से भटक गया है, परन्तु ईश्वर की दया और पुनर्स्थापना की राह खुली है। होशे 12 अध्याय में याकूब (अब्राहम के वंश) की कथा रूपक के साथ लायी जाती है—याकूब ने अपने जीवन में चालाकी दिखाई थी, परन्तु परमेश्वर से मिलने के लिए उसने टूट-फूट और विनम्रता से विनती की। इस शाब्दिक दृश्य में दूत से लड़ना, रोना, गिड़गिड़ाना—ये सब बहादुरी और आस्था के दो रूप हैं: संघर्ष और प्रत्यक्ष विनय। बेतेल का उल्लेख बताता है कि वही पवित्र स्थान और वही अनुभव, जहाँ याकूब ने स्वप्न में ईश्वर से मिलाप देखा था, वहीँ अब वह पुनः उनके समक्ष आता है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
थीमेटिक सार
समान्वित cross-references (संक्षेप में)
- उत्पत्ति 32:26-28 के साथ तुलना: याकूब दूत से भिड़कर आशीर्वाद के लिए तड़पता है; यह आस्था-आक्रोश और आशीर्वाद के बंधन को दर्शाता है। नोट: यहाँ केवल संदर्भ-स्वरूप उल्लेख है, पूर्ण पद नहीं दिया गया है। - भजन 42:2-3: दिल परमेश्वर के दर्शन के लिए तरसता है; संघर्ष के समय रोना-आह का महत्व उजागर होता है।
- रोम 8:26-27: पवित्र आत्मा हमारी कमजोरियों में सहायता करता है; आंतरिक विनय और आत्म-समर्पण के साथ ईश्वर-सम्पर्क संभव बनता है।
संक्षिप्त वास्तविक प्रेरणा
यदि कठिनाई में आप किसी ऐसी घड़ी से गुजर रहे हों जहाँ लगता है कि संघर्ष ही सेतु है, तो याद रखें: विनय और विनती से ईश्वर की उपस्थिति खुलती है। परमेश्वर आपके साथ है और बेतेल की स्मृतियाँ आपके विश्वास के प्रवाह को फिर से प्रज्वलित कर सकती हैं।
नोट: इस पाठ का गूढ़ दिग्दर्शन मार्गदर्शक विचारों के रूप में प्रस्तुत है; पुराने विद्वानों के स्पष्ट उद्धरणों के लिए नीचे दर्शित तीन पंक्तियाँ मात्र संक्षेप उदाहरणस्वरूप पहले से उपलब्ध उद्धरणों के अनुरूप हैं:
Matthew Henry (उद्धरण की सहजता): "..."
Albert Barnes (उद्धरण की सहजता): "..."
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