Old Testament
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होशे 6:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
हे एप्रैम, मैं तुझ से क्या करूँ? हे यहूदा, मैं तुझ से क्या करूँ? तुम्हारा स्नेह तो भोर के मेघ के समान, और सवेरे उड़ जानेवाली ओस के समान है।
होशे 6:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 6:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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होशे 13:3 (HINIRV) »
इस कारण वे भोर के मेघ, तड़के सूख जानेवाली ओस, खलिहान पर से आँधी के मारे उड़नेवाली भूसी, या चिमनी से निकलते हुए धुएँ के समान होंगे।

होशे 11:8 (HINIRV) »
हे एप्रैम, मैं तुझे क्यों छोड़ दूँ? हे इस्राएल, मैं कैसे तुझे शत्रु के वश में कर दूँ? मैं कैसे तुझे अदमा के समान छोड़ दूँ, और सबोयीम के समान कर दूँ? मेरा हृदय तो उलट पुलट हो गया, मेरा मन स्नेह के मारे पिघल गया है।

भजन संहिता 78:34 (HINIRV) »
जब वह उन्हें घात करने लगता*, तब वे उसको पूछते थे; और फिरकर परमेश्वर को यत्न से खोजते थे।
होशे 6:4 का अर्थ और संदर्भ
सीधे शब्दों में कहें तो यह भगवान की निष्ठा और इब्राहीम के प्रति उनके प्रेम की कमी की चिंता है—एप्रैम और यहूदा दोनों पर परमेश्वर कह रहा है कि उनका प्रेम भोर के मेघ के समान है, जिसे सूरज उगते ही उड़ जाना चाहिए। यहाँ संकेत है कि लोग या तो प्रेम-सम्बन्धन के भाव से दूर हो रहे हैं या उनके भरोसे और व्यवहार में अनियमितता है; ऐसा प्रेम स्थायी नहीं है और परिणामस्वरूप परमेश्वर एक कदम पीछे हटते हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
होशे किताब नबियों में से है जो इस्राइल के दो हिस्सों—उत्तरी राज्य इजराइल (एप्रैम) और दक्षिणी राज्य יהודה (यहूदा)—के घनिष्ठ अविश्वास, पाप और बिना-फल प्रेम को उजागर करती है। होशे के संदेश में बंटे हुए राष्ट्र की भूमिका, पहचाने जाने वाले पाप और धार्मिक दिखावे के पीछे असली दिल की कमी स्पष्ट है। इस पद में परमेश्वर उनकी अस्थिरता और अनिर्धारित प्रेम की नकल को उद्घाटित करते हैं, ताकि वे पश्चात्ताप करें।
interpretive observations (व्याख्यात्मक बिंदु)
थीमेटिक सूची
क्रॉस-रेफरेंस (संबद्ध वचन) और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) होशे 4:1–3 – पाप और न्याय के प्रति समाज की गम्भीर कमी: स्वयं को प्रेम के सामने ठोस बनाये रखने की आवश्यकता।
2) होशे 11:4 – परमशक्तियों के साथ प्रेम के बन्धन औरungk प्रतिपादन: प्रेम के व्यवहारिक संकेतों की महत्ता।
3) होशे 14:4 – पश्चाताप के द्वारा पुनः प्रेम की पुनर्स्थापना का आह्वान: ईश्वर की दयालुता और पागलपन के बीच वापसी संभव है।
सूक्ष्म निष्कर्ष और व्यावहारिक अनुप्रयोग
यह वचन व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के लिए संकेत देता है कि हमारे धार्मिक गीत और समारोह कितने भी आकर्षक हों, परन्तु यदि हमारा प्रेम स्थाई नहीं है और व्यवहार में नहीं उतरता, तो वह अल्पकालिक है। आत्म-समर्पण और छोटे-छोटे निर्णय—जैसे प्रतिदिन की प्रार्थना, सही नैतिकता, और दूसरों के साथ ईमानदारी—ही उस प्रेम को स्थायित्व देते हैं।
नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के समान विचारधारा के बिन्दुओं से प्रेरित सामान्य इनसाइट्स सम्मिलित हैं; यदि आवश्यक हो तो उनके लिखित एक-एक छोटे उद्धरण नीचे के स्तर पर उद्धृत किये जा सकते हैं.