Old Testament
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होशे 6:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि मैं बलिदान से नहीं, स्थिर प्रेम ही से प्रसन्न होता हूँ*, और होमबलियों से अधिक यह चाहता हूँ कि लोग परमेश्वर का ज्ञान रखें। (मत्ती 9:13, मत्ती12:7, मर. 12:33)
होशे 6:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 6:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मत्ती 9:13 (HINIRV) »
इसलिए तुम जाकर इसका अर्थ सीख लो, कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूँ; क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूँ।” (होशे 6:6)

मत्ती 12:7 (HINIRV) »
यदि तुम इसका अर्थ जानते कि मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं, तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। (होशे 6:6)

यशायाह 1:11 (HINIRV) »
यहोवा यह कहता है, “तुम्हारे बहुत से मेलबलि मेरे किस काम के हैं? मैं तो मेढ़ों के होमबलियों से और पाले हुए पशुओं की चर्बी से अघा गया हूँ; मैं बछड़ों या भेड़ के बच्चों या बकरों के लहू से प्रसन्न नहीं होता।
होशे 6:6 का अर्थ—स्थिर प्रेम की प्राथमिकता
इस आयत का सार यह है: परमेश्वर बलिदान से अधिक प्रेम की स्थिरता और जानने की चाह को चाहते हैं। किन्तु यह बात केवल औपचारिक पूजा को नहीं कहती; इसका उद्देश्य भक्त की अंतरात्मा में स्थिर प्रेम और ज्ञान का विकास है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
होशे के सप्ताह—इस पद में_prophetic complaint_ के साथ दिख रहा है कि इस्राएल ने कटोर और बाहरी रीतियों को भुला कर अंतःकरण की निष्ठा खो दी। उपहास नहीं, बल्कि परमेश्वर की माँग यह है कि जानने, समझने और स्थिर प्रेम के साथ जीवन जिया जाए। यह संदेश न्यायी व्यवस्था के साथ कल्याण की मांग को जोड़ता है: भक्ति केवल धर्मचर्या नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण विवेक है।
व्याख्या के मुख्य बिंदु
क्रॉस-रेफरेंस और उनका संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) मत्ती 9:13 — यीशु बलिदान से अधिक दया और ज्ञान की मांग करते हैं; यह संकेत करता है कि canvas पर दिखने वाला बाहरी उपाय भक्ति का पूरक है, न कि उसका स्थानापन्न।
2) मत्ती 12:7 — यीशु कहता हैं कि “बलिदान को निरुद्देश्य नहीं” किया जा सकता; परन्तु दया-सत्य से बलिदान का उद्देश्य पूरा होता है।
3) मरकुस 12:33 — प्रेम और ज्ञान के साथ परमेश्वर के कर्म की महत्ता पर बल देता है—उचित आचरण और शिक्षा का संतुलन।
काव्य-योजनात्मक नोट्स
- बलिदान के साथ ज्ञान और प्रेम की समृद्धि परमेश्वर के शासन के लिए आवश्यक है।
- धार्मिक रीति-रिवाज तब सजीव होते हैं जब उनका दायरा मानव-जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक ढांचे के साथ जुड़ा रहता है।
संहितात्मक सार
इस आयत का मूल संदेश यह है कि परमेश्वर की प्रसन्नता स्थिर प्रेम और उसकी पूर्ण समझ में है, न कि केवल बाहरी ritual में। यह चेतावनी देता है कि यदि हम प्रेम-ज्ञान के बिना केवल रीतियों में अटक जाएं तो हमारी भक्ति अधूरी रह जाएगी।
संक्षिप्त उपयोगी निष्कर्ष
— एक unified दृष्टिकोण: होशे 6:6 हमें यह याद दिलाता है कि prêt-प्रेरित पवित्रता जीवन-सम्बन्धी ज्ञान और प्रेम के केंद्र से निकलती है; जिसे परमेश्वर के अनुयायियों को आंतरिक निष्ठा के साथ निभाना चाहिए।