Old Testament
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होशे 11:8 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
हे एप्रैम, मैं तुझे क्यों छोड़ दूँ? हे इस्राएल, मैं कैसे तुझे शत्रु के वश में कर दूँ? मैं कैसे तुझे अदमा के समान छोड़ दूँ, और सबोयीम के समान कर दूँ? मेरा हृदय तो उलट पुलट हो गया, मेरा मन स्नेह के मारे पिघल गया है।
होशे 11:8 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 11:8 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यिर्मयाह 31:20 (HINIRV) »
क्या एप्रैम मेरा प्रिय पुत्र नहीं है? क्या वह मेरा दुलारा लड़का नहीं है? जब-जब मैं उसके विरुद्ध बातें करता हूँ, तब-तब मुझे उसका स्मरण हो आता है। इसलिए मेरा मन उसके कारण भर आता है; और मैं निश्चय उस पर दया करूँगा, यहोवा की यही वाणी है।

होशे 6:4 (HINIRV) »
हे एप्रैम, मैं तुझ से क्या करूँ? हे यहूदा, मैं तुझ से क्या करूँ? तुम्हारा स्नेह तो भोर के मेघ के समान, और सवेरे उड़ जानेवाली ओस के समान है।

मत्ती 23:37 (HINIRV) »
“हे यरूशलेम, हे यरूशलेम! तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थराव करता है, कितनी ही बार मैंने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठा कर लूँ, परन्तु तुम ने न चाहा।
होशे 11:8 पर टिप्पणी — संदर्भ और भावार्थ
पदरकथा में होशे तुलसीय इस्राएल के प्रति परमेश्वर की दया और क्रोध के बीच की आंतरिक संघर्ष को उजागर करते हैं। यहाँ परमेश्वर कहता है कि अहंकार और बिखरे हुए विश्वास के कारण इस्राएल को उसने छोड़ना नहीं चाहा, पर शत्रुओं के अधीन होकर जीना उसे अच्छा नहीं लगता। इस्राएल के प्रति दयाभाव और न्याय की आवश्यकता के बीच का यह उथल-पुथल, भविष्य में उद्धार के पथ की प्रतीकात्मक संभावना को भी संकेत करता है।
मुख्य भावार्थ
इन पदों में ईश्वर का करुणा-मन और पवित्र क्रोध एक साथ दिखता है: “हे एप्रैम, मैं तुझे क्यों छोड़ दूँ? … मेरा हृदय उलट पुलट हो गया, मेरा मन स्नेह के मारे पिघल गया है।” यह दर्शाता है कि परमेश्वर पाप के कारण निष्ठुर नहीं है, बल्कि उद्धार के लिए भावुक रहते हैं। जैसे एक प्रेमी अपने प्रेमी से टूटे सम्बन्ध को जोड़ना चाहता है, वैसे ही परमेश्वर इस्राएल से अपने सम्बन्ध को पुनः स्थापित करना चाहते हैं, परन्तु यह प्रेम पाप के परिणामस्वरूप होने वाले दण्ड से मुक्त नहीं होता।
दो-तीन प्रमुख विषय
संदर्भित और सम्बन्धित पाठ
1) होशे 11:1—ईश्वर का इस्राएल के प्रति बच्चों-सा प्रेम।
2) होशे 11:9—परमेश्वर का क्रोध और साथ ही उद्धार की इच्छा स्पष्ट होती है।
3) होशे 13:9—धर्म के कारण सचेतन दंड का उल्लेख।
इन संदर्भों में एक ही धारा बहती है: परमेश्वर की करुणा और न्याय एक साथ चलते हैं, और इब्राहीमी-जनमता के गहराई से उद्धार की आशा बनती है।
व्यावहारिक विचार
यह verse हमें यह सिखाता है कि परमेश्वर के प्रेम की गहराई तब ही स्पष्ट होती है जब हम अपनी निर्भरता घटाकर उसकी ओर लौटते हैं। जब जीवन में दबाव और असफलताएँ आएँ, तब भी परमेश्वर की करुणा के प्रति हमारी भरोसा बनाए रखना चाहिए, यह विश्वास कि वह हमारे लिए गलतियों को बुला कर भी पथ-दर्शन देता है।
संक्षिप्त समापन
होशे 11:8 इस संदेश का केंद्र है: परमेश्वर अपने दयालु प्रेम और जांच-परख की न्याय के बीच एक संतुलित मार्ग चाहते हैं। वह एप्रैम के लिए क्रोध नहीं, बल्कि प्रेम के साथ पुनःस्थापन चाहते हैं—यह पिछले इतिहास से भी जोतते हुए भविष्य की आशा रखता है।
यदि आप रोमांचक टिप्पणी पाते हैं
यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के मौलिक विचारों से प्रेरित संकल्पना को एक साथ समाहित करता है—यह दर्शाता है कि परमेश्वर का हृदय निष्ठा और प्रेम से भरा है।
क्रॉस-रेफरेंस स्पष्ट विचार: यहोवा का प्रेम-करुणा, न्याय के साथ युग-परिवर्तन के साथ जुड़ा है; उद्धार में विश्वास का पुनःस्थापन इसे संभव बनाता है।