Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीहोशे 11:2 बाइबल पद की व्याख्या
होशे 11:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
परन्तु जितना वे उनको बुलाते थे, उतना ही वे भागे जाते थे; वे बाल देवताओं के लिये बलिदान करते, और खुदी हुई मूरतों के लिये धूप जलाते गए।
होशे 11:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
होशे 11:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
उन बाइबल पदों को देखें जो विषय, शिक्षा या संदर्भ के आधार पर इस अंश से जुड़े हैं। समानांतर पदों की तुलना करने से इस वचन के संदर्भ और संदेश को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिलती है। किसी चित्र को चुनें और संबंधित पद, उसकी व्याख्या तथा पद-दर-पद बाइबल टीका देखें।

होशे 2:13 (HINIRV) »
वे दिन जिनमें वह बाल देवताओं के लिये धूप जलाती, और नत्थ और हार पहने अपने यारों के पीछे जाती और मुझको भूले रहती थी, उन दिनों का दण्ड मैं उसे दूँगा, यहोवा की यही वाणी है।

यिर्मयाह 18:15 (HINIRV) »
परन्तु मेरी प्रजा मुझे भूल गई है; वे निकम्मी वस्तुओं के लिये धूप जलाते हैं; उन्होंने अपने प्राचीनकाल के मार्गों में ठोकर खाई है, और राजमार्ग छोड़कर पगडण्डियों में भटक गए हैं*।

यशायाह 65:7 (HINIRV) »
क्योंकि उन्होंने पहाड़ों पर धूप जलाया और पहाड़ियों पर मेरी निन्दा की है, इसलिए मैं यहोवा कहता हूँ, कि, उनके पिछले कामों के बदले को मैं इनकी गोद में तौलकर दूँगा।”
होशे 11:2 — प्रवाह और चेतावनी: परिवार-विश्वास से तिरस्कार
परन्तु जितना वे उनको बुलाते थे, उतना ही वे भागे जाते थे; वे बाल देवताओं के लिये बलिदान करते, और खुदी हुई मूरतों के लिये धूप जलाते गए।
तकरीबन संदर्भ और तत्काल अवसर
यह पंक्ति भविष्यवक्ता होशे के समय के सामाजिक-धार्मिक विघटन को दर्शाती है। इस काल में यरूशलेम-परिवार और इस्रएल के लोग अपने परमेश्वर Yahweh की ओर बुलाहट का बार-बार सामना कर रहे थे, परन्तु उनकी प्रार्थनाएँ और चेतावनियाँ निकट-घंटों की कोशिशों के बजाय और अधिक दूरी तय करती जा रही थीं। वे अपने गढ़ों, देवताओं और मूर्तियों की तरफ लौटते रहे: बाल देवताओं के लिए बलिदान, धूप और पूजा की परंपराओं में लिप्त। यह एक प्रमुख चेतावनी है कि ईश्वर की बुलाहट के सामने भीतरी असंतोष और आत्म-स्वेच्छाचारिता कैसे बाधित कर सकती है।
यःशर्व से प्राप्त सीख: ईश्वर के प्रति विश्वास और विफलता
इस वचन में दिखता है कि परमेश्वर अपने चहेते लोगों के साथ कितना धैर्य रखते हैं, परन्तु उनके अन्दर विश्वास की कमी और श्रद्धा में ठहराव होने पर उद्धार की राह कठिन हो जाती है। यद्यपि ईश्वर अनेक बार यह स्पष्ट करते हैं कि वह एक ही परमेश्वर हैं, तब भी लोग अन्य देवताओं की पूजा अपनाते हैं, ताकि उनके क्षणिक सुख या सामाजिक सम्मान प्राप्त हो सके। यह पाठ हमें यह याद दिलाता है कि ईश्वर के लिए निष्ठा और एकनिष्ठता कितनी गहरी आवश्यकता है, क्योंकि वैसी-अवस्था में देव-प्रतिष्ठाओं की पूजा अंततः ईश्वर के साथ संबंध को नुकसान पहुंचाती है।
महत्वपूर्ण शब्द–छवि और उनके अर्थ
अन्य शास्त्रीय टिप्पणियाँ (सार-संबंध)
इस प्रकार के पाठ पर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke जैसे सार्वजनिक डोमेन टिप्पणीकार अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि परमेश्वर के साथ व्यावहारिक-आस्था का अभाव होकर भी लोग किंचित सामाजिक दबाव के कारण मूर्तिपूजा की राह पकड़े रहते हैं। छोटे उद्धरण-उद्धृत के बजाय, उनकी समेकित टिप्पणी में वे बताते हैं कि यह भयावह—परन्तु दयालु—चाल है, जिसमें ईश्वर बार बार पुकारते हैं, पर लोग पुनः पृथक होते हैं।
डायग्नोस्टिक संकेत: यह वचन किस प्रकार पुराने नियम में धार्मिक-धारणा के साथ सामाजिक-राजनीतिक दबावों की भी परीक्षा करवाता है। ईश्वर का प्रेम स्पष्ट रहता है, परंतु उसकी मांग है—एकात्म भाव और दृढ़ विश्वास की एकनिष्ठता।
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षिप्त अर्थ
1) यशायाह 1:11–14 — बाह्य-धार्मिक कर्मों के विरुद्ध उस आंतरिक पवित्रता की माँग।
2) होशे 4:12–13 — लोगों की आत्म-निर्भर पूजा-प्रथाओं में बदलाव; वास्तविक जुड़ाव की कमी।
3) कर्मियों 10:10 — शुद्धता और एकनिष्ठता के साथ परमेश्वर के समक्ष आस्था की आवश्यकता।
आज के संदर्भ में आवेदन
आज भी हम समान मानसिक चुनौती का सामना करते हैं—आत्मिक लगन के बजाय बनावटी-रूढ़ियों, सामाजिक मान-प्रतिष्ठाओं, और आकर्षक विकल्पों की ओर निर्भरता बढ़ती है। इस पाठ से प्रेरणा लेकर हम यह सोचें कि हमारे विश्वास का केंद्र कहां है—क्या हम परमेश्वर के बुलावे पर स्थिर रहते हैं, या सामाजिक-परंपराओं के पीछे भागते हैं? स्पष्ट और एकनिष्ठ आस्था वह मार्ग है जो हमारे जीवन में शांति, उचित निर्णय, और सामर्थ्य देता है।
नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों के स्वर को समग्रीक रूप से एकीकृत किया गया है; जहाँ संभव हुआ, उनके संकेतों के छोटे साक्षर उद्धरण सूचीबद्ध हैं।