Old Testament
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होशे 11:9 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
मैं अपने क्रोध को भड़कने न दूँगा*, और न मैं फिर एप्रैम को नाश करूँगा; क्योंकि मैं मनुष्य नहीं परमेश्वर हूँ, मैं तेरे बीच में रहनेवाला पवित्र हूँ; मैं क्रोध करके न आऊँगा।
होशे 11:9 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 11:9 समानांतर पद और संबंधित वचन
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गिनती 23:19 (HINIRV) »
परमेश्वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और न वह आदमी है कि अपनी इच्छा बदले। क्या जो कुछ उसने कहा उसे न करे? क्या वह वचन देकर उसे पूरा न करे? (रोम. 9:6-2, तीमु. 2:13)

यशायाह 55:8 (HINIRV) »
क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। (रोम. 11:33)

यशायाह 12:6 (HINIRV) »
हे सिय्योन में बसनेवाली तू जयजयकार कर और ऊँचे स्वर से गा, क्योंकि इस्राएल का पवित्र तुझमें महान है।”
होशे 11:9 का महत्व और संदर्भ
यहोवा यह पंक्ति हमारे सामने उसकी दयालुता और पवित्रता के एक संतुलित अभिवयक्ति के रूप में रखता है। होशे की पुस्तक में देवता अपने चुने हुए लोगों के साथ प्रेम-रिश्ता निभाते हुए भी उनकी आध्यात्मिक चूकों पर कड़ा संदेश देते हैं; परन्तु כאן प्रस्तुत शास्त्रीय घोषणा बताती है कि परमेश्वर का क्रोध सरलता से उफन नहीं सकता, क्योंकि वह केवल न्याय नहीं बल्कि पवित्रता और निष्ठा की सत्ता है। इस verse का संदेश यह है कि परमेश्वर स्पष्ट और दृढ़ हैं, पर उनका क्रोध मानव-उत्पादन नहीं है; वे मनुष्य नहीं और न वे अपराजेय कठोर अत्याचार करते हैं, बल्कि वे अपने निवास-स्थल में रहते हैं और उनके पवित्र स्तम्भ बने रहते हैं।
पार्श्वभूमि और मूल संदर्भ
होशे का गीत मुख्यतः इस्राएल के पारिवारिक रिश्ते, विशेषकर एप्रैम के असंतोष और राम-रिश्ते के ढलते पतन के समय का है। यहूदा और इस्राएल के लिए बार-बार चेतावनियाँ हैं—परन्तु होशे स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि प्रभु ने अपने चयनित लोगों के लिए किसी प्रकार की अस्थिरता नहीं अपनाई है; उनके साथ का वाचा-संबंध अभी भी जीवित है। इस अंश में परमेश्वर अपने क्रोध को केवल क्षणभंगुर नहीं बनाते, बल्कि यह क्रोध उनके पवित्रता और लोगों से सचेत रहने की मांग का परिणाम है।
मुख्य संदेश
इस verse का केंद्र यह है: परमेश्वर अपने क्रोध को बिन कारण नहीं उठाते; वे करुणा के साथ-साथ पवित्र न्याय के अधिकारी हैं। “मैं मनुष्य नहीं परमेश्वर हूँ” कहकर वह स्पष्ट करते हैं कि उनका स्वरूप और व्यवहार पृथ्वी के प्रभाव से परे है—वे बीच में रहते हैं, गरिमा और पवित्रता से। इस कथन में एक सक्रिय सुरक्षा और संयम का सिद्धांत है: प्रभु अपने लोगों के लिए यही चाहते हैं कि वे उनके साथ रहें, और अपने पवित्रता-नियमों के अनुरूप जीवन में लौटें।
धार्मिक थीम्स और bağlantı
सारांश में क्रॉस-रेफरेंस
यहोशे 11:9 को अन्य अनुभागों से जोड़कर समझना मदतगार है:
इन संदर्भों से एक केंद्रीय विचार उभरता है: परमेश्वर की क्रोध-प्रकृति न्याय और करुणा के मधुर संतुलन में प्रकट होती है, जो नागरिक जीवन और विश्वास-यात्रा दोनों को दिशा देती है।
व्यावहारिक देवotional विचार
हम सभी जब अपने जीवन में विपरीत परिस्थितियों से घिरे होते हैं, तो यह वाक्य याद दिलाता है कि परमेश्वर का निवास और उसकी पवित्रता हमारे साथ है। वह क्रोध करता है केवल तब जब हमारा हृदय सख्त और अविश्वासी रहता है; पर वह भी हरथा करुणामय रहता है यदि हम सचमुच पलटकर उसी के पास आते हैं। जीवन में कितनी भी कमी-कमजोरी क्यों न हो, उसका हाथ कभी अस्वीकार नहीं होता। एक सरल प्रार्थना हो सकती है: कृपा कर, मुझे अपने पास बुला ले और मेरी राहों को तेरे अनुसार बना दे।
मुख्य संदेश: परमेश्वर का निवास-स्थल और पवित्रता का आह्वान आज भी हमारे लिए है—हम अपने दुष्चक्रों को छोड़ कर उनके साथ खड़े हों।
निर्देशित पाठ
अगर आप चाहें तो इस अध्याय के संदर्भ में आगे के वचन देखें और आत्म-चिंतन के लिए प्रत्येक दिन एक छोटे-छोटे प्रश्न पूछें: क्या मेरी जिंदगी में परमेश्वर के पवित्र नियमों का सम्मान है? क्या मैं अपने क्रोध को pagkakata में नियंत्रित कर पाता/पाती हूँ? क्या मैं प्रभु के साथ अपने रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए वास्तविक कदम उठाते/होती हूँ?
उद्धृत टिप्पणीकारों के संक्षिप्त निष्कर्ष: होशे के इस अंश में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke ने इस भावना को बल दिया है कि परमेश्वर की करुणा और पवित्रता, दोनों का समन्वय ईश्वर के चरित्र का केंद्रीय भाग है। उनकी दृष्टि में यह नहीं कि प्रभु क्रोध से भय पैदा करते हैं, बल्कि वह सुधार के लिए बुलाते हैं ताकि लोग दया-मार्ग पर लौट आएँ।