Old Testament
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मत्ती 23:1 मत्ती 23:2 मत्ती 23:3 मत्ती 23:4 मत्ती 23:5 मत्ती 23:6 मत्ती 23:7 मत्ती 23:8 मत्ती 23:9 मत्ती 23:10 मत्ती 23:11 मत्ती 23:12 मत्ती 23:13 मत्ती 23:14 मत्ती 23:15 मत्ती 23:16 मत्ती 23:17 मत्ती 23:18 मत्ती 23:19 मत्ती 23:20 मत्ती 23:21 मत्ती 23:22 मत्ती 23:23 मत्ती 23:24 मत्ती 23:25 मत्ती 23:26 मत्ती 23:27 मत्ती 23:28 मत्ती 23:29 मत्ती 23:30 मत्ती 23:31 मत्ती 23:32 मत्ती 23:33 मत्ती 23:34 मत्ती 23:35 मत्ती 23:36 मत्ती 23:37 मत्ती 23:38 मत्ती 23:39



यरूashलेम की वेदना और ईश्वरीय करुणा – मत्ती 23:37 से संदर्भ
यह वचन मसीह की करुणा और नतीजों के संकेत को एक साथ प्रस्तुत करता है। मत्ती 23 अध्याय में यीशु के कड़े वाक्यों के बीच एक तीखी दयालुता उभरती है—यही नहीं कि उनका प्रेम अत्यंत गहराई से है, भले ही लोगों ने उनकी चेतावनियों और पैगम्बरों के संदेश को अस्वीकार किया हो। यहाँ यरूशलेम के प्रति Jesus का दिव्य दया, उसका निवेदन और भविष्य के परिणाम एक साथ पढ़ते हैं।
कथन की जगह और समझ
पद 37 में यीशु यरूशलेम को संबोधित करते हैं—एक शहर जो परमेश्वर के izbor के केंद्र के रूप में माना गया, लेकिन जहाँ लोगों ने बंदीभावना, अवहेलना और कठोरतापूर्ण अस्वीकार से उसका उद्धार टाला। “भविष्यद्वक्ताओं को मार डालना” और “पत्थराव” जैसी भावनाएँ उस समय के धार्मिक नेतृत्व के अंधत्व और उनके आत्म-विश्वास के जोखिम को दर्शाती हैं। फिर भी Jesus की करुणा, जैसे मुर्गी अपने चूजों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठा करना, एक माँ के समान सुरक्षा और संरक्षण का संकेत है। यस अध्याय में यीशु की चेतावनी स्पष्ट है, पर उसकी करुणा भी अस्पष्ट नहीं—जो घर के भीतर के खतरे से भी अधिक, बाहरी खतरे को रोकना चाहता है।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
अनुच्छेदित तुलना और संदर्भ
यह पाठ प्रेरितों के इतिहास में पवित्रता, दया और नृशंसता की परतों को उजागर करता है। बाहर की ओर पढ़ते समय, वे वही तत्व देखते हैं जो डरोन और नीतिपरक नेताओं में थे, परन्तु भीतर परमेश्वर की इच्छा शरण और सुरक्षा की है।
संकेतित पारिश्रमीय संदर्भ:
2-3 उन्नत विचार (पाठ के अनुप्रयोग के लिए)
छोटा-सा क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षेप व्याख्या
- मत्ती 23:37 के साथ संबंधित शिक्षाएँ: पवित्रता और दया के बीच संतुलन का पाठ।
- यरमी 3:19-22 में परमेश्वर की दया का उल्लेख, जहाँ वह अपने लोगों से पुनः नज़दीकी चाहता है।
- लुकás 13:34-35 में यीशु का शहर के प्रति दु:ख और रक्षा का आग्रह।
संक्षेप निष्कर्ष
मैत्रीपूर्ण चेतावनी और करुणामय निवेदन एक साथ चलते हैं—यही मसीह की दृष्टि है। जिन लोगों ने ईश्वर के संदेशों को ठुकराया, उनके लिए भी यीशु में सुरक्षा और वापसी की उम्मीद है। यह पद हमें यह दिखाता है कि परमेश्वर के हृदय में करुणा निरंतर है, भले ही मानवीय अवहेलना क्यों न हो।
महत्वपूर्ण उद्धरण (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke):
- निश्चित वचनात्मक उपदेशों के साथ, ये commentators अपने-अपने ढंग से यही बात कहते हैं कि परमेश्वर की इच्छा है कि लोग सुरक्षित रहें, परन्तु अवहेलना के कारण उनकी योजना पूरी नहीं हो पाती।
- उपलब्ध संकलनों में विशेष पंक्तियाँ उपलब्ध हैं जो करुणा-न्याय के संतुलन को स्पष्ट करती हैं।