याकूब 5:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

एलिय्याह भी तो हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था; और उसने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की*; कि बारिश न बरसे; और साढ़े तीन वर्ष तक भूमि पर बारिश नहीं बरसा। (1 राजा. 17:1)

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याकूब 5:17 पद-दर-पद बाइबल टीका

याकूब 5:17 पर टिप्पणी: Elijah के समान मानव दुर्बलता और प्रार्थना की शक्ति

मुख्य interpretive बिंदु: एलिय्याह भी एक सामान्य मनुष्य था, पर उसकी प्रार्थना ने प्रकृति को नियंत्रण किया; यह दिखाता है कि ईश्वर के सामने धैर्यपूर्ण, भरोसेमंद और विनम्र प्रार्थना कितनी प्रभावी होती है। याकूब दर्शाते हैं कि श्रद्धा-प्रार्थना से आलतिक सफलताएं मिलने लायक हो सकती हैं, जब व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में रहते हैं और अपनी कमजोरियों को भी ईश्वर के वरदान के भरोसे में रखते हैं।

साहित्यिक-संदर्भ (लिटरेरी कॉन्टेक्स्ट)

याकूब बताता है कि विश्वास और कर्म एक साथ चलते हैं; केवल विश्वास से उद्धार नहीं मिलता, न ही केवल कर्म से। एलिय्याह का संदर्भ 1 Kings 17:1 से जुड़ता है: उसने औरतों के आह्वानों के बीच नहीं, बल्कि परमेश्वर के आदेश से वर्षा को रोकने की माँग की; यह दर्शाता है कि बिना परमेश्वर की अनुमति के कुछ नहीं होता। याकूब 5:17-18 में प्रार्थना की दोहरी भूमिका दिखती है— दुःख-सुख में ईश्वर के साथ संबंध, और स्थितियों के अनुसार पाबंद होना।

केंद्रीय theological significance

- प्रार्थना में विश्वास और धैर्य का संयोजन: एलिय्याह ने गंभीर आत्म-समर्पण और विनम्रता के साथ प्रार्थना की, और परिणामस्वरूप भारी प्राकृतिक नियंत्रण पाया गया।

- प्रकृति पर प्रभुत्व का सार: परमेश्वर की योजना में पृथ्वी और आकाश दोनों नियम के भीतर हैं; हमारी प्रार्थनाएं तब प्रभाव डालती हैं जब वे ईश्वर के निर्देशों और समय के अनुरुप हों।

Scripture cross-references (संक्षेपित, निष्कर्षित)

  • 5: Mas. 1:11-12 — धैर्य और निर्भय भरोसा; धैर्य के कारण अन्ततः वरदान मिलता है।
  • 1 Kings 17:1 — एलिय्याह की प्रारम्भिक घोषणा के साथ क्रमबद्ध प्रार्थना-आह्वान; प्रकृति के नियमों पर प्रभुत्व की तस्वीर।
  • James 4:2-3 — तीव्र इच्छाओं के कारण द्वंद्व और प्रार्थना का सही उद्देश्य; परमेश्वर के साथ सही संबंध का महत्त्व।

ये संदर्भ उस एक धारणात्मक धागे को जोड़ते हैं कि ईश्वर के प्रति प्रार्थना में सही उद्देश्य, समर्पण और विश्वास रहने पर परमेश्वर समय-समय पर समर्थन देता है।

Reflection questions (संक्षिप्त)

  • क्या मैं अपनी प्रार्थनाओं में अपेक्षाओं के साथ-साथ ईश्वर की मर्जी को भी मान देता हूँ?
  • क्या मेरी निर्भरता सांसारिक परिस्थितियों से उभरकर ईश्वर के भरोसे में है?
  • क्या मैं एलिय्याह की तरह परिस्थितियों के बीच ईश्वर के प्रभुता का सम्मान कर रहा हूँ?

निष्कर्ष

याकूब 5:17 कहता है कि एलिय्याह हमारे समान एक मानवीय व्यक्ति था—उसने डरे नहीं, बल्कि गिड़गिडाकर प्रार्थना की और परिणामस्वरूप वर्षा रोकी गई। यह हमें यह स्मरण कराता है कि दुख-सुख में ईश्वर के साथ सच्ची निर्भरता और विश्वासभरी प्रार्थना ही वास्तविक ताकत है। हमारी प्रार्थना अगर ईश्वर के उद्देश्य और समय के अनुरूप हो, तो वह प्रकृति तक में परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।

प्लेस किए गए उद्धरण (Public-domain commentators)

अगर आवश्यक हो, नीचे दिए गए प्रचलित विचारों में से दो-तीन पंक्तियाँ उद्धृत की जा सकती हैं—परन्तु पूर्ण पाठ नहीं:

Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संबद्ध सार्थक अवलोकन में से संक्षेपगत टीका: “...प्रार्थना जो विश्वास के साथ की जाती है, उसे ईश्वर कभी अस्वीकार नहीं करता।”

कृपया ध्यान दें: नीचे दिए गए उद्धरण सुसংकृत संदर्भ के अनुसार हैं; पूर्ण वाक्य उद्धृत नहीं किये गये हैं ताकि मूलभाव सुरक्षित रहे।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

याकूब 5:17 समानांतर पद और संबंधित वचन

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तिशबी एलिय्याह* जो गिलाद का निवासी था उसने अहाब से कहा, “इस्राएल का परमेश्‍वर यहोवा जिसके सम्मुख मैं उपस्थित रहता हूँ, उसके जीवन की शपथ इन वर्षों में मेरे बिना कहे, न तो मेंह बरसेगा, और न ओस पड़ेगी।” (लूका 4:25, याकूब. 5:17, प्रका. 11:6)

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1 राजाओं 18:1 (HINIRV) »
बहुत दिनों के बाद, तीसरे वर्ष में यहोवा का यह वचन एलिय्याह के पास पहुँचा, “जाकर अपने आप को अहाब को दिखा, और मैं भूमि पर मेंह बरसा दूँगा।”

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लूका 4:25 (HINIRV) »
मैं तुम से सच कहता हूँ, कि एलिय्याह के दिनों में जब साढ़े तीन वर्ष तक आकाश बन्द रहा, यहाँ तक कि सारे देश में बड़ा आकाल पड़ा, तो इस्राएल में बहुत सी विधवाएँ थीं। (1 राजा. 17:1, 1 राजा. 18:1)

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