लूका 4:25 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

मैं तुम से सच कहता हूँ, कि एलिय्याह के दिनों में जब साढ़े तीन वर्ष तक आकाश बन्द रहा, यहाँ तक कि सारे देश में बड़ा आकाल पड़ा, तो इस्राएल में बहुत सी विधवाएँ थीं। (1 राजा. 17:1, 1 राजा. 18:1)

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लूका 4:25 पद-दर-पद बाइबल टीका

लूका 4:25 पर टिप्पणी — संदर्भ और अर्थ

यूहन्नी वाक्यों के पहले भाग में यीशु ने नबी-like उद्घोषणा के साथ अपने प्रेरित भक्तों को चेताया कि परमेश्वर की करूणा और कृपा किसी विशेष समुदाय तक सीमित नहीं है। लूका 4:25 में यीशु कहते हैं कि एलिय्याह के दिनों में आकाश बन्द रहा और तीन साल के समय बड़ा आकाल पड़ा, फिर भी यहूदियों के भीतर कई विधवाएँ थीं। यह बतलाता है कि परमेश्वर के आशीर्वाद और चमत्कार जब-तब आदेशित समय पर केवल एक विशिष्ट समूह तक सीमित नहीं रहते, बल्कि व्यापक पृष्ठभूमि और विश्वास की उनकी योजना के अनुसार चलते हैं।

मुख्य विचार

यह वचन यीशु के सामाजिक-धार्मिक क्रम से बाहर जाकर व्यवस्था के अनुसार चमत्कार की पहुँच की सीमाओं को उठाने की बात करता है। एलिय्याह और आगमी घटनाओं के संदर्भ से संकेत मिलता है कि कठिन समय में भी ईश्वर की निजी उदारता और व्यवस्था किसी एक जाति-समुदाय तक नहीं सिमटती, बल्कि विश्वास के पात्रों के लिए खुली रहती है।

दो तीन प्रमुख विषय

  • ईश्वर की सार्वभौमिक करुणा: यहूदी समुदाय के भीतर भी जरूरतमंदों तक ही नहीं, बल्कि समस्त राष्ट्रों के लिए परमेश्वर की दया और सहायता कभी-भी आ सकती है।
  • नियति का समय और ईश्वर की सत्ता: आकाश का बन्द होना और आकाल संकेत देता है कि परमेश्वर के समय-सारिणी में घटनाओं की एक निश्चित योजना है, जिसे मनुष्य भागीदारी के साथ समझते हैं।
  • विश्वास की दृष्टि: जो लोग वास्तविक विश्वास रखते हैं, वे कठिन समय में भी परमेश्वर की विश्वसनीयता को पहचानते हैं और उनकी दया को स्वीकारते हैं।

संबद्ध पाठ और उनसे जुड़ाव

1 राजा 17:1 और 1 राजा 18:1 के संदर्भ में एलिय्याह के समय के ऐतिहासिक पाठ याद दिलाते हैं कि आकाल और चमत्कार एक निष्क्रिय इतिहास नहीं, बल्कि परमेश्वर की सार्वजनिक महिमा दिखाने के उपकरण हैं। साथ ही यहूदा-राजा और प्रत्यक्ष उद्धार की घटनाओं में भी ईश्वर की योजना एकरूप नहीं रहती; वह गरीब और निर्बल के साथ रहते हैं।

व्यावहारिक विचार

हमारे जीवन में कठिन समय आते हैं; तब भी याद रखें कि ईश्वर की कृपा विश्वव्यापी है। अपनी पीड़ा के बीच आप किस प्रकार विश्वास में ईश्वर के समय और योजना को मानते हैं, यह आपकी आस्था को मजबूत कर सकता है। दूसरों के प्रति दया और मदद के क्षेत्र में उठना, इस संदेश के अनुरूप है—क्योंकि परमेश्वर की करुणा केवल श्रेणियों तक सीमित नहीं रहती।

क्रॉस-रेफरेंस और संक्षेप व्याख्या

- 1 राजा 17:1: एलिय्याह का ऐतिहासिक परिचय और आकाल की शुरुआत। यह संदर्भ बताता है कि प्रभु के कार्य समय और स्थान के अनुसार चलते हैं।

- 1 राजा 18:1: अग्नि-प्रवर्तन और ईश्वर की शक्ति दिखाने वाला क्षण। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कठिन समय में भी परमेश्वर उपकार दिखाते हैं।

- मत्ती 23:37-39: यीशु का दृढ़ आह्वान कि वह अपनी नगरी को नहीं छोड़ते, और उनकी चिंगारी से प्रेरणा मिलती है कि ईश्वर का प्रेम क्षेत्रीय सीमाओं से परे है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यह वचन बताता है कि परमेश्वर के आशीर्वाद और चमत्कार किसी एक समाज या समूह तक सीमित नहीं हैं; वह समय और परिस्थिति के अनुसार निर्बलों, विधवाओं और अन्य संस्थाओं के लिए भी क्रिपा दिखाते हैं। हमारे लिए प्रेरणा यह है कि विश्वास में रहते हुए हम उनके समय को मानें और संसार के हर वर्ग के लिए दया और सहायता का हाथ बढ़ाएं।

तुलनात्मक उद्धरण (स्रोत): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संक्षिप्त विचारों से संगत पंक्तियाँ सामान्य स्वर में संकलित हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

लूका 4:25 समानांतर पद और संबंधित वचन

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तिशबी एलिय्याह* जो गिलाद का निवासी था उसने अहाब से कहा, “इस्राएल का परमेश्‍वर यहोवा जिसके सम्मुख मैं उपस्थित रहता हूँ, उसके जीवन की शपथ इन वर्षों में मेरे बिना कहे, न तो मेंह बरसेगा, और न ओस पड़ेगी।” (लूका 4:25, याकूब. 5:17, प्रका. 11:6)

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याकूब 5:17 (HINIRV) »
एलिय्याह भी तो हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था; और उसने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की*; कि बारिश न बरसे; और साढ़े तीन वर्ष तक भूमि पर बारिश नहीं बरसा। (1 राजा. 17:1)

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क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। (रोम. 11:33)

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