Old Testament
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लूका 4:1 लूका 4:2 लूका 4:3 लूका 4:4 लूका 4:5 लूका 4:6 लूका 4:7 लूका 4:8 लूका 4:9 लूका 4:10 लूका 4:11 लूका 4:12 लूका 4:13 लूका 4:14 लूका 4:15 लूका 4:16 लूका 4:17 लूका 4:18 लूका 4:19 लूका 4:20 लूका 4:21 लूका 4:22 लूका 4:23 लूका 4:24 लूका 4:25 लूका 4:26 लूका 4:27 लूका 4:28 लूका 4:29 लूका 4:30 लूका 4:31 लूका 4:32 लूका 4:33 लूका 4:34 लूका 4:35 लूका 4:36 लूका 4:37 लूका 4:38 लूका 4:39 लूका 4:40 लूका 4:41 लूका 4:42 लूका 4:43 लूका 4:44



लूका 4:2 पर सरल अर्थ
यही वचनों में यीशु forty दिन तक शैतान की परीक्षा से गुजरते हैं; भूख लगना उनके मानवीय अनुभव का भाग है, और यह परीक्षा के समय पर विजय पाने की दृढ़ता को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यूहन्नी और मराय के समान, लूका इस घटना को प्रभु यीशु के आ kamen के आरम्भिक चरणों के रूप में प्रस्तुत करता है। वनवास के Forty दिनों में, यीशु ने बिना कुछ खाए समय बिताया ताकि वह अपने सार्वजनिक मंत्रालय के पहले चरण के लिए आत्म-नियंत्रण और दृढ़ विश्वास विकसित करें। यह दृश्य बताता है कि वे सामान्य मनुष्य की ही तरह भूख, थकान और परीक्षा से गुजरते हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन पर टिके रहते हैं।
interpretive observations
थीम्स का छोटा सूची
अन्यों संदर्भ और उनके सार
व्याख्यात्मक संदर्भ 1: अन्य गवाहियाँ दिखाती हैं कि यीशु ने भूख एवं थकान में भी परमेश्वर के उद्देश्य को प्राथमिकता दी। यह प्रेरित करता है कि हम भी कठिन समय में ईश्वर की सेवकाई को प्राथमिकता दें।
व्याख्यात्मक संदर्भ 2: प्रमाण देते हैं कि शैतान की परीक्षा यहाँ प्रारम्भिक मिशन के लिए प्रेरणा और नीति-निर्माण का उपकरण है—कौन से उत्तर वचन-आधारित हों, न कि तर्क से।
व्याख्यात्मक संदर्भ 3: इस घटनाक्रम से हमें यह सीख मिलती है कि प्रभु यीशु के चरित्र में चमत्कारिक शक्ति से नहीं, पवित्र वचन से विजय मिलती है।
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनके संक्षेप
1) मत. 4:1-2: यीशु का पवित्र आत्मा के द्वारा प्रभावी रूप से प्रेरित होना और फिर शैतान की परीक्षा से गुजरना—विवेकपूर्ण नियंत्रण और प्रतिबिंब का उदाहरण।
2) मत्ती 4:3-4: शैतान के तीन परीक्षणों के क्रम और यीशु का प्रतिउत्तर; उसने लिखा हुआ वचन उद्धृत किया।
3) मर 1:12-13: शुरुआत में यीशु का जंगल में एक समय-सीमा के साथ परीक्षण; यह उनके सार्वजनिक कार्य की ओर संकेत है।
व्यावहारिक takeaway
कठिन समय में भी हमें पवित्रशास्त्र की प्रमाणिकता पर टिके रहना चाहिए; भूख-तजुर्बा हो या अन्य पक्ष, यीशु के जैसे वचन की शक्ति और आत्म-नि depend करती है। आत्म-नियंत्रण, परमेश्वर के उद्देश्य पर विश्वास, और शांति के साथ जीवन बिताने की प्रेरणा लें।
मुख्य विचार: भूख और कमजोरी के क्षण भी परमेश्वर की योजना के साथ जुड़ने के अवसर बनते हैं, जब हम उसकी वाणी पर निर्भर रहते हैं।
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उद्धृत विशिष्ट टिप्पणियाँ (संक्षित):
Matthew Henry (संशोधित सार): "जहाँ आत्मा के फल के साथ परमेश्वर के प्रस्ताव पर टिके रहते हैं, वह भी भूख और क्लांतता के समय अपनी सहायता दे सकता है।" (सार रूपांतरण)
Albert Barnes (संश्लेषित सार): "शक्ति केवल बाह्य चमत्कार में नहीं, परमेश्वर के शब्द की आस्था में है; यीशु ने वचन से उत्तर दिया, ताकि अज्ञानता द्वारा न चले।"
Adam Clarke (संक्षिप्त सार): "परेशानियों के समय वचन के स्पर्श से ही विजय संभव है; यीशु ने प्रलोभन के दौरान नैतिकता और न्याय की मिसाल प्रस्तुत की।"