Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 4:1 लूका 4:2 लूका 4:3 लूका 4:4 लूका 4:5 लूका 4:6 लूका 4:7 लूका 4:8 लूका 4:9 लूका 4:10 लूका 4:11 लूका 4:12 लूका 4:13 लूका 4:14 लूका 4:15 लूका 4:16 लूका 4:17 लूका 4:18 लूका 4:19 लूका 4:20 लूका 4:21 लूका 4:22 लूका 4:23 लूका 4:24 लूका 4:25 लूका 4:26 लूका 4:27 लूका 4:28 लूका 4:29 लूका 4:30 लूका 4:31 लूका 4:32 लूका 4:33 लूका 4:34 लूका 4:35 लूका 4:36 लूका 4:37 लूका 4:38 लूका 4:39 लूका 4:40 लूका 4:41 लूका 4:42 लूका 4:43 लूका 4:44



लूका 4:34 पर टिप्पणी—व्याख्या और प्रवर्तन
यह श्लोक दानव-उद्धार के दृश्यों के बीच आता है, जहाँ यीशु Geh-बलपूर्वक अपने उपदेश के पहले पन्ने खोलते हैं। उन्नीसवीं सदी के वेदांत-सम्पादन नहीं, बल्कि सार्वजनिक-डायरी के सार्वजनिक-उद्धरणों की तरह नहीं—यहां एक असामान्य आवाज निकलती है: एक मानसिक और आध्यात्मिक संघर्ष जो दिखाता है कि लोग मसीह के सामने किस तरह ग्रहणशील या असहज हो सकते हैं। लूका 4:34 में एक व्यक्ति पुकारकर कहता है कि वह यीशु को पहचानता है और कहता है कि वह परमेश्वर का पवित्र जन है। यह दुष्ट-घोषणा नहीं, बल्कि एक तेजस्वी पहचान है—परन्तु उसकी प्रेरणा और उद्देश्य पर प्रश्न उठते हैं।
पात्रों के बीच संदर्भ में verse का विचार
वाक्य में पहले एक चिह्न है—“हम तुझ से क्या काम? क्या तू हमें नाश करने आया है?” यह एक स्पष्ट आक्रामक प्रश्न है जो यीशु के अधिकार और उनकी पवित्रता पर सीधा हमला है। वही उद्धृत करता है, “तू परमेश्वर का पवित्र जना है,” जो आंतरिक पहचान की गूंज है पर विरोध के साथ। यह दृश्य दिखाता है कि शैतान-जैसी आवाज़ें भी आकर मानवीय दिल को चुनौती देती हैं, पर यीशु का उत्तर उसकी सत्ता के सामने दृढ़ रहता है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस verse से सीखने योग्य मूल संदेश यह है कि यीशु का परिचय और पहचान आत्मविश्वास के साथ आता है, और दुष्टों की आवाज़ अपनी पूर्णता में असफल हो जाती है। यीशु न तो डरते हैं और न उनसे डरे हुए दानव; वे उसकी पहचान को सत्य के रूप में मानते हैं, परन्तु उनकी योजना और नियंत्रण परमेश्वर के अनुसार है। यह संतोषजनक विश्वास देता है कि मसीह की पवित्रता और अधिकार बाधाओं के बावजूद सच हैं।
पवित्र ग्रंथों के साथ तुलना
- मार्क 1:23-26 में एक ही प्रकार के दृश्य चलते हैं, जहां दुष्ट आत्मा यीशु के पास आता है और तुरंत उनके अधिकार को मानता है। यह दर्शाता है कि यीशु के प्रभुत्व की सत्ता दुष्ट-आवाजों से भी ऊँची है।
- मत्त 8:29 में भी एक दुष्ट-आत्मा यीशु को पहचानता है—पर यहाँ प्रतिक्रिया अलग है, क्योंकि शुद्धता और पवित्रता के साथ यीशु उनकी सत्ता को चुनौती देते हैं।
- यूहन्ना 1:12-13 में विश्वास के द्वारा प्रभु के पुत्रत्व की पहचान व्यक्ति के भीतर उतरती है; यह दिखाता है कि पहचान और साक्षात्कार का लक्ष्य दिल की परिवर्तनशीलता है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरेंस और संक्षिप्त टिप्पणी
• मार्क 1:23-26: दुष्ट आत्मा का यीशु के साथ स्पष्ट पहचान और उनके अधिकार की अभिव्यक्ति।
• मत्ती 8:29: यीशु के सामने दुष्टों की पहचान और उनके दावे की प्रतिक्रिया।
• यूहन्ना 1:12-13: विश्वास द्वारा पुत्रत्व की पहचान की प्रार्थना और परिवर्तन।
संक्षेप निष्कर्ष
इस पंक्ति में यह स्पष्ट है कि मसीह की पवित्रता और परमेश्वर के अधिकार पर न किसी दुष्ट-आवाज की प्रबलता है, न किसी भ्रम की जगह। यीशु ने अपने परिचय को एक धारदार सत्य के रूप में प्रस्तुत किया: जो भी सच्ची पहचान है वह देव-आशीष और ता Enkel के साथ है, और उसे स्वीकारना जीवन में नयी दिशा लाता है।
नोट: इस टिप्पणी मेंMatthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विशिष्ट लघु उद्धरण केवल तभी चिन्हित किया गया है जब उपलब्ध हैं।