Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
न्यायियों 15:1 न्यायियों 15:2 न्यायियों 15:3 न्यायियों 15:4 न्यायियों 15:5 न्यायियों 15:6 न्यायियों 15:7 न्यायियों 15:8 न्यायियों 15:9 न्यायियों 15:10 न्यायियों 15:11 न्यायियों 15:12 न्यायियों 15:13 न्यायियों 15:14 न्यायियों 15:15 न्यायियों 15:16 न्यायियों 15:17 न्यायियों 15:18 न्यायियों 15:19 न्यायियों 15:20



न्यायियों 15:4 के पाठ की तात्पर्यशील पृष्ठभूमि
यह पद शिमशोन की शक्ति-सम्बद्ध परीक्षा और उसकी सामान्य प्रतिशोध-भावना के क्रम में आता है। पहले के प्रसंगों में शिमशोन ने पचास लोहे के नाखूनों, फिर फारसीयों के विरुद्ध एक-एक कदम उठाए थे; यहाँ वह अपने प्रतिशोध की योजना लेकर आता है। तीन सौ लोमड़ियाँ पकड़ना और उनके पूंछों पर एक-एक मशाल बाँधना एक चतुर, पराक्रमी और निर्णायक योजना है जिसका उद्देश्य मजदूरी और विजय की प्रतीक्षा में शत्रु पर अचानक आक्रमण करना है।
पाठ का तत्काल संदर्भ: क्या करता है शिमशोन?
शिमशोन ने लोमड़ियों को पकड़कर उनके पूंछों पर मशालें बाँध दीं और उन्हें डाकुओं की तरह घुमाते हुए भड़काऊ हमला किया। इससे उनके द्वारा जाल बुनने का एक गूढ़, चालाक तंत्र सामने आता है—बना हुआ संकट और चतुर रणनीति एक साथ। यह घटना शक्ति नहीं, बल्कि योजना और धर्म-संरक्षण के एक साहसी कदम के रूप में प्रस्तुत होती है, जिसमें शिमशोन की निर्भरता परमेश्वर की सहायता पर दिखती है।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ की सीख
यह अध्याय एक कठोर जीत की कसौटी है, जहां विश्वास की शक्ति उन साधनों से नहीं मापी जाती जो लोक-परम्पराओं में सामान्य हैं, बल्कि वह परमेश्वर की मार्गदर्शन और पलटवार के भरोसे से दिखती है। शिमशोन की योजना में परमेश्वर के निर्देश की अपेक्षा और उसकी प्रेरणा का स्थान स्पष्ट है—क्योंकि यह कार्रवाई असामान्य और जोखिमभरी है, पर पीछे परमेश्वर की कृपा और नेतृत्व है।
महत्वपूर्ण शब्दों तथा चिह्नों कीclarification
अनुसृत क्रॉस-रेफरेंसेस
− न्यायियों 14–16 के आसपास की घटनाओं में श shimshon की वीरता, अनुशासन और परमेश्वर के साथ उसकी निर्भरता का चित्रण मिलता है। एक तरफ उसकी चतुर योजना और दूसरी तरफ देव-निर्देशन का संतुलन पाठक को विश्वास की वास्तविक शक्ति का स्मरण कराता है।
− अन्य कुरआनों में भी छेड़छाड़ और निर्णय के समय परमेश्वर के निर्देश मिलते हैं जिनमें आदमी के हाथ में शक्ति होते हुए भी उसकी सफलता का स्रोत परमेश्वर का आशीर्वाद होता है।
हिंदी पाठ के लिए 2-3 उपयुक्त संदर्भ और उनके संक्षिप्त निष्कर्ष
1) न्यायियों 14–15: शिमशोन की कमजोरियों के बावजूद परमेश्वर उसकी ताकत बनकर सामने आता है; इसका अर्थ है कि धर्म-सत्य और प्रभु की योजनाएं अक्सर मानवीय पथभ्रष्टताओं के बीच भी चलती हैं।
2) दाऊद की शत-प्रतिष्ठा के समय परमेश्वर की सहायता: यह बताता है कि किस प्रकार दृढ़ विश्वास और Dieu की कृपा विजय के मार्ग प्रशस्त करती है।
आज के संदर्भ में आवेदन
यह पाठ हमें स्मरण कराता है कि आलोचनात्मक समय में भी हमें परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रेरणा पर भरोसा रखना चाहिए। हमारी योजनाओं में भी जबरदस्त साहस और चतुराई हो सकती है, पर उनकी सफलता परमेश्वर की योजना के अनुरूप ही होगी। जरूरत है—धैर्य, विवेक और नैतिकता के साथ कार्य करना, ताकि हमारी “रणनीतियाँ” बनते-बनते परमेश्वर के उद्देश्य के अनुरूप हों।
टिप्पणीकारों के संक्षिप्त विचार (संयोजन)
इस पाठ पर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के प्रकाशनों से कुछ संकेत मिलते हैं: यह दर्शाता है कि परमेश्वर की सत्ता कभी-भी मनुष्यों के आत्म-विश्वास से ऊपर है; रणनीति और वीरता को भी परमेश्वर के आशीर्वाद से ही पूर्णता मिलती है। अगर आवश्यकता हो तो वे नोट करते हैं कि शिमशोन की कार्रवाई में नीति-निष्ठा और न्याय के प्रति सजगता एक साथ रहती है।
कथा-सार: न्याय और शक्ति का संयोजन, परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप एक साहसी कदम—यह पाठ आज भी साहस और विश्वास की मिसाल देता है।