Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
न्यायियों 6:1 न्यायियों 6:2 न्यायियों 6:3 न्यायियों 6:4 न्यायियों 6:5 न्यायियों 6:6 न्यायियों 6:7 न्यायियों 6:8 न्यायियों 6:9 न्यायियों 6:10 न्यायियों 6:11 न्यायियों 6:12 न्यायियों 6:13 न्यायियों 6:14 न्यायियों 6:15 न्यायियों 6:16 न्यायियों 6:17 न्यायियों 6:18 न्यायियों 6:19 न्यायियों 6:20 न्यायियों 6:21 न्यायियों 6:22 न्यायियों 6:23 न्यायियों 6:24 न्यायियों 6:25 न्यायियों 6:26 न्यायियों 6:27 न्यायियों 6:28 न्यायियों 6:29 न्यायियों 6:30 न्यायियों 6:31 न्यायियों 6:32 न्यायियों 6:33 न्यायियों 6:34 न्यायियों 6:35 न्यायियों 6:36 न्यायियों 6:37 न्यायियों 6:38 न्यायियों 6:39 न्यायियों 6:40
न्यायियों 6:7 इस verse का महत्व
यह वचन दर्शाता है कि इस्राएलियों की मजबूरी और उनके आह्वान से परमेश्वर के प्रति उनकी निर्भरता कैसे उभर कर आती है। जब वे अत्याचार और विपत्ति से घिरे थे, तब उनका नम्र दोष-संयम और भरोसा यहूदियों के परमेश्वर की ओर मोड़ देता है। यह पाठ स्पष्ट करता है कि कठिन समय में ईश्वर अपने लोगों की पुकार सुनते हैं, और उनकी आशाओं को सम्हालते हैं।
original context (पृष्ठभूमि)
न्यायियों 6 में मिद्यानियों द्वारा इस्राएलियों पर अत्याचार चरम पर था। मिद्यानियों ने इस्राएल को विशाल नुकसान पहुँचा कर भूमि पर आवाजाही रोक दी थी; फसलें बर्बाद हो रहीं, आबादी भयित था, और आशा की किरणें धुँधली हो गई थीं। अगरत इन्हीं परिस्थितियों में गिलयाल के कबीले से गुजरते हुए, गिदोन ने इस्राएल के इतिहास में एक बार पुनः उद्धार की उम्मीद उठाई। इस संदर्भ में 7–8 वाक्य अभिनय करते हैं—यह मिद्यानियों के अत्याचार के समय ईश्वर की सहायता की आवश्यकता और यहूदियों की तपस्या का स्वरूप है।
मुख्य संदेश
जब लोग गहराई से दयनीय हो जाते हैं और सहायता के लिए पुकार उठाते हैं, तब परमेश्वर अपनी देह-उद्धार योजना के आधार पर कदम उठाते हैं। यह विचार कि दयालु परमेश्वर न केवल उत्तर देता है, बल्कि अपने लोगों की विद्यमान कमजोरियों के बीच भी शक्ति और मार्गदर्शन देता है, इस पाठ की केंद्रीय धुरी है।
मुख्य विषय-विकास
Cross-references (संश्लेषणात्मक जुगाड़)
इन आयतों के साथ कुछ अन्य बाइबिल संदर्भ मिलते हैं जो संघर्ष के बीच विश्वास के मार्गदर्शन को पुष्ट करते हैं:
इन संबद्ध संदर्भों से स्पष्ट होता है कि विपत्ति के बीच भी परमेश्वर का साथ और उद्धार सभी के लिए उपलब्ध है, यदि हम उसकी ओर टिके रहें।
पारिवारिक-आत्मिक अनुप्रेरणा
इस verse से एक सरल, पर गहरा प्रश्न निकलता है: क्या हम भी विपत्तियों के समय अपने आत्म-विश्वास को वापस नहीं ले लेते? क्या हमारी पहली प्रतिक्रिया भय से है या आह्वान से है? परमेश्वर का उत्तरदायित्व यही है कि वह अपनी शक्ति से हमारी कमज़ोरियों को सामर्थ्य में बदल दें, जब हम उसे पुकारते हैं।
Brief devotional reflection
कभी-कभी हमें अपनीulim कमजोरियों के कारण हताशा घेर लेती है। पर यह पाठ स्मरण कराता है कि परमेश्वर तब भी सक्रिय रहते हैं जब हम अपनी सहायता के लिए दया-भरे आह्वान करते हैं। निराशा के बीच भी विश्वास की छोटी चिंगारी परमेश्वर की कृपा से प्रज्वलित हो सकती है। याद रखें—आपकी पुकार उसे आस्तीन चढ़ कर नहीं, बल्कि दिल से उठी उम्मीद के साथ पहुँचती है।
कृपया टिप्पणियाँ: इस पंक्ति में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त उद्धरण उपलब्ध हैं यदि आप चाहें।