लूका 11:42 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“पर हे फरीसियों, तुम पर हाय! तुम पोदीने और सुदाब का, और सब भाँति के साग-पात का दसवाँ अंश देते हो, परन्तु न्याय को और परमेश्‍वर के प्रेम को टाल देते हो; चाहिए तो था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। (मत्ती 23:23, मीका 6:8, लैव्य. 27:30)

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लूका 11:42 पद-दर-पद बाइबल टीका

लूका 11:42 पर चर्चा – फरीसियों के धर्म-यापन में न्याय और प्रेम की महत्ता

इस पद में यीशु फरीसियों को उनके दिखावे से सचेत करते हैं: वे सजावट और दान-दक्षिणता के बाहरी कर्मों में व्यस्त रहते हैं, परन्तु परमेश्वर के सामर्थ्यपूर्ण नियम—न्याय और प्रेम—को भूल जाते हैं। यह संदेश पुराने नियम के धर्म-कर्म और न्याय की सही कसौटी को उजागर करता है: परमेश्वर चाहता है कि हम बाहरी रीति-रिवाज के साथ-साथ आंतरिक परिवर्तन भी दिखाएं।

कथा के स्थान में verse का स्थान

यह पद लूका 11 के बयानकारी सन्दर्भ का भाग है जहाँ यीशु फरीसियों और शास्ताओं के नेताओं के दिखावे पर कड़ायी टिप्पणी कर रहे हैं। वे दसवाँ अंश देते हैं, पाती-पाति की आडंबर करते हैं, परन्तु जरूरी न्याय, दया और परमेश्वर के प्रेम को भूला देते हैं। यह एक संतुलन की माँग है: धार्मिकता और नैतिकता दोनों एक साथ चलें।

मुख्य सीख

  • धार्मिक कर्तव्य केवल बाहरी कर्म नहीं हैं; इनके साथ आंतरिक नैतिकता, न्याय और प्रेम भी अनिवार्य हैं।
  • कर्तव्य-विहीन दिखावे से नहीं, परिपूर्ण चरित्र से परमेश्वर प्रसन्न होते हैं।

संयुक्त पंथ-तुलना (cross-references)

1) मत्ती 23:23 — यह समान चेतावनी देता है कि नगण्य कर्मों पर जोर अधिक है परन्तु न्याय और दया से चूक है; दोनों की आवश्यकता है।

2) मीका 6:8 — ईश्वर के लिए क्या अपेक्षित है—न्याय, प्रेम, नम्रता; बाहरी कर्मों से अधिक आंतरिक कर्तव्य की मांग।

3) लैव्यव sty 27:30 — दाँत-भोजन और देवदार के मामलों में भी सर्वस्वस्वरूपता का महत्व दर्शाया गया है कि समर्पण में ईमानदारी हो।

व्यावहारिक अनुप्रयोग

किसी भी धार्मिक कार्य से पहले आत्म-निरीक्षण करें: क्या हमारे प्रयास दूसरों को दिखाने के लिए हैं या परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप दया, न्याय और प्रेम के कारण हैं? छोटी-छोटी परम्पराओं में भी यदि अतिरेक है—जड़त्व और धारणा बनती है—तो उन्हें संतुलित करें ताकि आन्तरिक परिवर्तन बाहरी कर्मों के साथ मेल खाए।

संक्षेप

यह वचन提醒 देता है कि धार्मिकता का वास्तविक अर्थ बाहरी चादर के पीछे नहीं, बल्कि दिल की स्थिति में है। न्याय और परमेश्वर के प्रेम को वर्तमान स्थिति में अत्यावश्यक मानना चाहिए, और उनका पालन करने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है।

एतिहासिक टिप्पणी (संक्षेप रूप में)

फरीसियों की आलोचनात्मक बातों में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की पंक्तियाँ उद्धृत हैं जिन्होंने बताया कि बाहरी धार्मिकता यदि आंतरिक न्याय और दया से कटे रहे तो उसका प्रभाव सीमित रहता है। Oberfläche में ये टिप्पणीकार यह स्पष्ट करते हैं कि धार्मिकता के दोनों अंश—कर्म और चरित्र—समान आवश्यक हैं।

यह पाठ-विश्लेषण एक साथ मिलकर बताता है कि सच्ची भक्ति वह है जो परमेश्वर के प्रेम के साथ न्याय की मांग को पूरा करे, न कि केवल बाहर के नियमों को निभाने तक सीमित रहे।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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“हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवाँ अंश देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों अर्थात् न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते।

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मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूँ; मैं अपनी सब कमाई का दसवाँ अंश भी देता हूँ।’

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शमूएल ने कहा, “क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्‍न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्‍न होता है? सुन, मानना तो बलि चढ़ाने से और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है। (मर. 12:32,33)

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