Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 11:1 लूका 11:2 लूका 11:3 लूका 11:4 लूका 11:5 लूका 11:6 लूका 11:7 लूका 11:8 लूका 11:9 लूका 11:10 लूका 11:11 लूका 11:12 लूका 11:13 लूका 11:14 लूका 11:15 लूका 11:16 लूका 11:17 लूका 11:18 लूका 11:19 लूका 11:20 लूका 11:21 लूका 11:22 लूका 11:23 लूका 11:24 लूका 11:25 लूका 11:26 लूका 11:27 लूका 11:28 लूका 11:29 लूका 11:30 लूका 11:31 लूका 11:32 लूका 11:33 लूका 11:34 लूका 11:35 लूका 11:36 लूका 11:37 लूका 11:38 लूका 11:39 लूका 11:40 लूका 11:41 लूका 11:42 लूका 11:43 लूका 11:44 लूका 11:45 लूका 11:46 लूका 11:47 लूका 11:48 लूका 11:49 लूका 11:50 लूका 11:51 लूका 11:52 लूका 11:53 लूका 11:54



लूका 11:32 पर टिप्पणी (HINIRV)
पद का संदर्भ: यद्यपि यीशु निंदा करने वालों की भारी आलोचना करते हैं, यह पद यह दिखाता है कि परमेश्वर के राज्य के संदेश से परिवर्तन संभव है, भले ही वह पहले न मानते हों। योना के प्रचार का उल्लेख एक चेतावनी के रूप में है कि नीनवे के लोग जिन्होंने प्रचार सुनकर मन बदला, वे इस शख्स से बड़े उदाहरण बन जाते हैं जो यहाँ उपस्थित है।
मुख्य भाव: न्याय के दिन पर ग्रहणवादी चेतावनी
यह पाठ बताता है कि परमेश्वर के संदेश के सामने हृदय का परिवर्तन कितना आवश्यक है। यीशु योना के समय की प्रतिक्रिया को उद्धृत कर नीनवे के लोगों के परिवर्तन के प्रमाण को प्रस्तुत करते हैं, ताकि उनके ज़िम्मेदार न रहने पर भी वे उस दिन के निर्णय के सामने सचेत रहें। यहाँ “यहाँ वह है, जो योना से भी बड़ा है” excavates Jesus’ greater prophetic authority और कुछ पुरानी कथा के माध्यम से नये साक्षात्कार का संकेत देता है।
दो–तीन प्रमुख थीम
संबद्ध क्रॉस-रेफरेंसे
1) योना 3:5-10 — नगर नीनवे ने तेज़ी से पलटना स्वीकार किया; यह अस्थिरता के खिलाफ एक प्रत्यक्ष उदाहरण है कि किस प्रकार सत्य के समय पर प्रतिक्रिया आवश्यक है।
2) मत्ती 12:41 — योना के समान एक दखलदार उदाहरण के रूप में, सत्य के सामने मन बदलना और अभियोग स्वीकारना—परमेश्वर के राज्य की पुष्टि।
3) मत्ती 26:64 — यीशु के अपनी उँचाई और दायित्व की घोषणा, कि वह मानवजाति के लिए “बड़ा है”—यानी वह निर्णायक प्रवर्तक हैं।
व्यावहारिक चिंतन
हम में से प्रत्येक को यह प्रश्न करना चाहिए: क्या मैं प्रभु के संदेश के सामने प्रतिक्रियात्मकता से काम ले रहा हूँ या आंतरिक परिवर्तन के लिए तत्पर हूँ? जैसे નीनवे के लोग सचेत हुए, वैसे ही हमें भी अपने जीवन-आचरण, विचार और अभिलाषाओं को ईश्वर के प्रकाश के अनुरूप ढालना चाहिए। यह पाठ यह याद दिलाता है कि समय का उठाल कठिन पर साहसिक निर्णयों के साथ आता है—यही धर्म-जीवन का वास्तविक परीक्षण है।
संक्षिप्त समापन
लूका 11:32 हमारे लिए यह संदेश रखता है कि परमेश्वर के राज्य का शोर हर समय है और उसे स्वीकारना या अस्वीकारना हमारे हृदय के परिवर्तन पर निर्भर है। योना के प्रचार से नीनवे ने जो किया, वही सच में यीशु के उपदेश के सामने हमारे दायित्व का आह्वान है: परिवर्तन से ही जीवन मिलता है, और परिवर्तन में ही ईश्वर की महिमा प्रकट होती है।