Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 12:2 का गरिमा-पूर्ण अर्थ
कान्हे और बुद्धि के बीच चयन में यह पद हमे प्रत्यक्ष करता है कि यहोवा भले मनुष्य के साथ प्रसन्न होते हैं, परन्तु बुरी युक्ति करने वालों को वह दोषी ठहराता है। संदर्भ में यह कवि-परिक्षेप उन लोगों पर है जो व्यवहार, निर्णय और नीति में ईमानदारी बनाये रखते हैं बनिस्बत उन लोगों के जो छल-छद्म से लाभ उठाने की सोच रखते हैं। यह वचन नीति-शास्त्र की सहजता दर्शाता है कि बुरे कर्म के परिणाम अन्तत: दण्ड के रूप में सामने आते हैं, भले कर्म के सूरज के नीचे भी प्रकाश मिलता है।
केन्द्रित अर्थ
यह वचन दो विपरीत प्रवृत्तियों का विवेचन करता है: एक है विनम्र, सत्यप्रिय और परमेश्वर-आश्रित मनुष्य; दूसरा है चालाक, कपटपूर्ण और लाभ के लिए अविश्वसनीय मार्ग अपनाने वाला व्यक्ति। परमेश्वर के दृष्टिकोण में इन दोनों के फल स्पष्ट रूप से विभेदित होते हैं: भला मनुष्य परमेश्वर की प्रसन्नता का कारण बनता है, जबकि बुरी युक्ति करने वाला अन्ततः दोषी ठहरता है।
मुख्य विषय
पवित्र ग्रंथ से जुड़ी दृष्टि
यह वचन उदाहरण देता है कि स्वर्गीय न्याय दिन-प्रतिदिन के व्यवहार से आकार लेता है। प्रार्थना, विनम्रता और सत्यनिष्ठा से भरा जीवन परमेश्वर की कृपा को आकर्षित करता है; रहस्यपूर्ण चालाकी और दूसरों को ठेस पहुँचाने वाली युक्तियाँ अंततः निष्फल हो जाती हैं।
सम्बन्धित पद
नीति-ग्रंथ के अन्य अंश— जैसे कि नीतियों में सत्य और साधुता की महत्ता बताने वाले वचन—समर्थन देते हैं कि ईमानदारी और परिश्रम से ही स्थायी सुरक्षा मिलती है (उदा., कोड़े-चालाकी का असफल होना, दया और सत्य के साथ चलना)। साथ के संदर्भ यह भी संकेत करते हैं कि दुष yुक्ति से प्राप्त लाभ अस्थायी है और परमेश्वर की नज़र में उसे अधिक मात्रा में न्याय मिलता है।
व्यावहारिक चिंतन
हर दिन के निर्णयों में स्पष्ट करता है कि आप किस प्रकार की युक्ति चुनते हैं। एक छोटा-सा झूठ भी विश्वास-निर्भर संबंधों को नुकसान पहुँचा सकता है, जबकि सत्य और ईमानदारी से बने व्यवहार से दूसरों में आस्था और सम्मान बढ़ता है। अपने कदमों को परमेश्वर के मार्ग पर सीमित रखें, और हर योजना के पहले उसकी सलाह माँगें।
संक्षिप्त निष्कर्ष
नीतिवचन 12:2 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर भले मनुष्यों के साथ आनंदित होते हैं जबकि बुरी योजनाओं को निभाने वालों को न्याय के दायरे में लाना उनकी व्यवस्था है। आस्तिक जीवन वही है जो सत्य, नम्रता और परमेश्वर-आश्रित युक्ति के साथ चलता है।
संदर्भ-चर्चा
1) नीतिवचन 10:9 — सत्य और स्थिरता की प्रतिष्ठा। 2) यिर्मयाह 17:9 — दिल की चाल सबसे गहरी प्रेरणा बताती है। 3) मीका 6:8 — परमेश्वर के सामने न्याय और करुणा के साथ चलना उचित है।
निकट-गवाही उद्धृत स्रोतों से पूर्वोक्त विचारात्मक सार इस प्रकार हैं: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के चिंतन-तत्वों को संतुलित रूप से समाहित करते हुए सरल-सा निष्कर्ष निकाला गया है।