Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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वाक्य का सीधे अर्थ
नीतिवचन 12:9 कहता है: जो इसे अपनी दैनिक भोजन से वंचित होकर भी अपना बड़ा-मोटा प्रदर्शन दिखाते हैं, उनके सामने एक विनम्र, परिश्रमी व्यक्ति ही सच्चा श्रेष्ठ माने जाते हैं। यह कथन बताता है कि सम्मान और प्रतिष्ठा तब तक मूल्यहीन है जब तक वह मेहनत से कमाई न हो और वास्तविक जीवनचर्या सत्यता और ईमानदारी पर टिकी हो।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह पद नीतिवचन促进 में सामाजिक मूल्य-वस्तु का दोहराव है: बाहरी शान-शौकत और आंतरिक नैतिकता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। गिनती और नम्रता, कर्मठता और धनी-शाही दिखावे के भीतर एक गहरी पात्र-निर्माण की शिक्षा देता है। लेखक दार्शनिक ढंग से नहीं, बल्कि व्यवहारिक बुद्धिमानी से बताता है कि सचमुच सम्मान मेहनत और ईमानदारी से आता है, न कि दिखावे से।
व्याख्यात्मक अवलोकन
- जो अपने बारे में डींगे मारता है, पर खाने को रोटी तक नहीं—यह परिचय देता है उस व्यक्ति के यथार्थ से कटे-फटे घमण्ड के बारे में, जो असत्य दिखावा कर रहा है।
- "दास रखनेवाला साधारण मनुष्य" से तात्पर्य एक ऐसे समर्थन-व्यक्ति से है जो सच्ची योग्यता और मेहनत से आगे बढ़ता है—यानी गुण-सम्पन्न और भरोसेमंद।
- नीतिवचन में ऐसी सामाजिक अपेक्षा है कि वास्तविक उपलब्धि और सम्मान वेतन-परिश्रम से आता है, बिना दिखावे के ही लोग सम्मान पाते हैं।
ऐतिहासिक टिप्पणी और एकत्रित विचार
यह मानसिकता समानुभाग की मांग करती है: अपने आचरण में ईमानदारी रखना, ताकि सामान्य व्यक्ति भी उच्च मान-पद पा सके। यह शिक्षा साधारण सफलताओं को भी सम्मानित बनाती है, न कि केवल बड़े दिखावे को।
संवेदनशील क्रॉस-रेफरेंस
इन संदर्भों में प्रयोजन यह है कि बाहरी प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि आंतरिक नैतिकता और परिश्रम पर ध्यान दिया जाए।
खास उद्धरण और संकलन
इस पंक्ति के स्वर के अनुरूप, मौलिक पवित्र-चर्चित टिप्पणियाँ यह बताती हैं कि ईमानदारी और कड़ी मेहनत से प्राप्त सफलता ही वास्तविक सम्मान बनाती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
सार है: वास्तविक प्रतिष्ठा ऐसी व्यक्ति से आती है जो भोजन-आसक्ति के भीतर नहीं, बल्कि कठोर परिश्रम और सत्यनिष्ठा से जीवन बनाता है। यदि आप दिखावे से नहीं, बल्कि योग्यता और नैतिक धरोहर से ऊँचाई पाते हैं, तब समाज सबसे पहले आपकी आंतरिक मान्यता को मानता है।