Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीति वचन 14:10 पर दृष्टिकोण: मन ही मन का दुःख और परदेशी की असहायता
मुख्य interpretive point: मनुष्य का आन्तरिक दुःख उसके भीतर का है; बाहर से वह जिसे छुपा नहीं सकता, और सचेत व्यक्ति अपने जख्मों को ईश्वर के समक्ष विक्षेपित कर सकता है। इस पद में आत्म-समझ और आत्म-स्वीकृति की सक्रियता है, जहाँ व्यक्ति अपने दुख को पहचान कर उसे परमेश्वर के प्रकाश में रख देता है, ताकि परदेशी जिसे हम बाहर से देखते हैं, वह भी थाम सके।
साहित्यिक संदर्भ (Literary Context)
नीतिवचन का यह भाग बुद्धि और विवेक पर बल देता है। इस पंक्ति में "मन" और "परदेसी" के बीच का दर्द उभरकर आता है: मन का दुःख आध्यात्मिक और भावनात्मक है, जिसे न तो परदेसी समझ सकता है न उसे बाहरी नज़र से मापा जाना चाहिए। यह एक व्यक्तिगत, आंतरिक संघर्ष है जो सामाजिक पर्देबाज़ी से परे है।
धार्मिक-संरचना एवं theological significance
इस वाक्य में ईश्वर के सामने आत्म-निष्कर्ष और ईमानदार आत्म-समझ आवश्यक है। जब मन अपना दुःख जानता है, तो वह परमेश्वर के दया-प्रभा के साथ वास्तविक संवाद शुरू कर सकता है। साथ ही यह भी संकेत देता है कि बाहरी प्रतिक्रियाएं, जैसे किसी के आनंद में चिपकना, अक्सर वास्तविक दुख को ढक नहीं पातीं; मन का आंतरिक अनुभव ही सत्य है जिसे ईश्वर देखता है।
अन्य ग्रंथों के साथ संबंध (Cross-references)
इन संदर्भों से स्पष्ट है कि आंतरिक दुःख का मानना और उसे ईश्वर के साथ साझा करना, न कि उसे दबाये रखना, आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
प्रश्न-Reflection
सार और निष्कर्ष (Concise conclusion)
नीतिवचन 14:10 हमें सिखाता है कि आन्तरिक पीड़ा की वास्तविकता को पहचानना तथा उसे ईश्वर के समक्ष खोलना आध्यात्मिक ताजगी की कुंजी है। बाहर की प्रसन्नता अक्सर अस्थायी हो सकती है; पर आंतरिक मंथन और ईश्वर-निर्भरता स्थायी शांति की दिशा में ले जाती है।]
एम.एच. (Matthew Henry) के कुछ छोटे उद्धरण जो उपयुक्त हैं: “A man’s own sorrow is inward to himself.”
एलबर्ट बार्न्स (Albert Barnes) से विचार: “The heart knows its own misery, and a false cheeriness cannot be imposed upon it.”
आडम क्लार्क (Adam Clarke) की टिप्पणी: “The inward sorrow is known to itself; it resists a mere outward appearance of joy, and seeks the light of God.”