Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 28:19 का संदर्भ-परिसर
यह पद एक साधारण, पर गहराई से प्रेरित व्यवस्था प्रस्तुत करता है: जो खेत को जोतकर अपनी जीविका कमाता है—वह अपने प्रयासों के अनुसार भोजन पाएगा—परन्तु जो निष्क्रियता, निर्बल संगति या निर्जीव सांस्कार के साथ रहते हैं, वे गरीबी के किनारों तक पहुँचते हैं। यहाँ खेत-जोतना एक प्रत्यक्ष प्रतीक है कि कर्म, योजना और परिश्रम ईश्वर की नियम-बद्ध दुनिया में परिणाम लाते हैं।
पद में परमेश्वर और विश्वास के बारे में जो खुलासा होता है
यह पाठ ईश्वर के पालनहार नियमों के साथ मानव के उत्तरदायित्व की याद दिलाता है: परिश्रम और उत्तम कर्म से समर्थ जीवन बनता है, जबकि निकम्मापन और अस्थिर संगत न केवल आर्थिक कमी बल्कि नैतिक ढहाव también ला सकते हैं। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, दृढ़ता और संयम से जीवन बनता है, और वह अपनी अनुग्रह से उस मार्ग को भी समर्थ करता है जो कड़ी मेहनत को नेक परिणामों से जोड़ता है।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्ट व्याख्या
“अपनी भूमि को जोता-बोया करना”—यह प्रत्यक्ष कृषि-चालित जीवन शैली का चित्र है, जो प्रयत्नशीलता, योजना और समय के साथ फल देता है। “निकम्मे लोगों की संगति”—यहाँ संगति से आशय उन समुच्चयों या लोगों से है जिनके जीवन का केंद्र निष्क्रियता, अवश्य-दूरस्थ लापरवाही, और अंततः आडंबरपूर्ण व्यवहार है। परिणामस्वरूप, “कंगालपन” एक बाहर के आर्थिक परिणाम के साथ-साथ भीतर की असंतोष और अस्त-व्यस्त जीवन को भी संकेत करता है।
तुलन-पत्र: मिलती-जुलती व्याख्याएं
– Matthew Henry: परिश्रम से ही स्थिरता आती है; बहुधा दुष्ट संगति से जीवन का रास्ता अवरोधित होता है। “The desire of the diligent is to prosper”—यह विचारधारा इस पाठ के आधार में है।
– Albert Barnes: कर्म और मार्ग में निरंतरता का महत्त्व; जो संगति में ढीलेपन को अपनाता है, वह अपनी प्रतिष्ठा और संपत्ति दोनों गंवा सकता है।
– Adam Clarke: कृषि-उद्योग और आत्म-उत्कर्ष के बीच संबंध स्पष्ट करता है—उद्योग ही आंतरिक और बाह्य सम्पन्नता की चाबी है।
संयुक्त सार-संयोजन
यह पद दो प्रवृत्तियों के बीच चयन प्रस्तुत करता है: एक यह कि मेहनत, योजना और धैर्य जीवन के भरण-पोषण को सुनिश्चित करते हैं; दूसरी यह कि निष्क्रियता, गलत संगति और नैतिक लचरता गरीबी के द्वार खोलती है। परमेश्वर इन प्रवृत्तियों का मानक देता है: जिस जीवन में कर्म और विश्वास दोनों चलते हैं, वहाँ उपलब्धियाँ और आस्था grosses होते हैं।
प्रयुक्त-आज की आयाम
क्रॉस-रेफरेंसेज़ (संदर्भ) और व्याख्या
1) प्रस्थान-उद्धरण: नीतिवचन 21:5—परिश्रम ही सफलताओं की आधारशिला है; जल्दबाजी और अव्यवस्था कभी-कभी नुकसान पहुंचाती है।
2) गिरजाघर की समझ: यशायाह 55:2-3—आत्मिक आहार के साथ भौतिक परिश्रम का मिलना सत्य है; खोखले-खर्च से नहीं चलेगा।
3) याक़ूब 2:26—आत्मा बिना काम के मर जाती है; कर्म और विश्वास एक साथ चलते हैं।
निष्कर्ष रूप में, यह पाठ आज भी एक सरल, लेकिन गहरी निर्देशन देता है: दृढ़ परिश्रम और चारित्रिक संगति बनाए रखें; तब ईश्वर का आशीर्वाद और मानसिक-आत्मिक तरक्की एक साथ बढ़ती है।