Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 28:1 नीतिवचन 28:2 नीतिवचन 28:3 नीतिवचन 28:4 नीतिवचन 28:5 नीतिवचन 28:6 नीतिवचन 28:7 नीतिवचन 28:8 नीतिवचन 28:9 नीतिवचन 28:10 नीतिवचन 28:11 नीतिवचन 28:12 नीतिवचन 28:13 नीतिवचन 28:14 नीतिवचन 28:15 नीतिवचन 28:16 नीतिवचन 28:17 नीतिवचन 28:18 नीतिवचन 28:19 नीतिवचन 28:20 नीतिवचन 28:21 नीतिवचन 28:22 नीतिवचन 28:23 नीतिवचन 28:24 नीतिवचन 28:25 नीतिवचन 28:26 नीतिवचन 28:27 नीतिवचन 28:28

नीतिवचन 28:3 का सीधा अर्थ
निर्धन पुरुष जो निर्धनता के कारण कमजोरों पर अत्याचार करता है, वह भारी वर्षा की तरह है जो भोजन-वस्तु को भी नहीं छोड़ती। सरल शब्दों में यह पाठ यह संकेत देता है कि पाप का लाभ उठाकर गरीबों को दबाने वाला पति- or पुरुष सामाजिक अनुचितता के सख्त परिणाम भुगतता है; उसका व्यवहार प्रकृति के विपरीत, बुरे समय में उसकी नियमित तंगहाली और दोष-युक्त व्यवहार को बढ़ावा देता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
नीतियों के साहित्य में निर्धन और दीन-दलित पर अन्याय करना एक गंभीर पाप माना गया है। यह पद सामाजिक न्याय के हिंसक उथल-पुथल को सामान्य बनाता है—जो न केवल व्यक्ति के कर्मों का प्रतिफल है, बल्कि समुदाय की नैतिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डालता है।>
कुल मिलाकर, यह आयत्त करता है कि अन्यायिक संपत्ति-संरक्षण या दबाव डालना, चाहे वह किसी भी कारण से हो, परमेश्वर के साथ एक तरह की अग्नि-सी परीक्षा है जो अंततः प्राकृतिक और नैतिक परिणामों के साथ उभरती है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
संशोधनात्मक क्रॉस-रेफरेंस
1) नीतिवचन 14:31 – गरीब के विरुद्ध अत्याचार करना परमेश्वर के साथ अविश्वास है; संदिग्धता के बिना, दयालुता भी दिखनी चाहिए।
2) प्रकाशित वाक्यों 3:17 – निष्ठा और न्याय से परे की क्रूरता निकट भविष्य में कठिनाई लाती है।
3) निर्गमन 22:21–23 – निर्बलों के विरुद्ध अन्याय न करने की प्रेरणा देता है; उनके अधिकारों की सुरक्षा करते हुए समाज का संतुलन बनता है।
चर्चित उद्धरण (पारंपरिक टिप्पणीकारों से चयनित विचार)
Matthew Henry: “धन-दौलत के साथ अन्याय करने वाला अंततः खुद ही कष्ट पायेगा, क्योंकि प्रकृति और न्याय का नियम बराबर चलता है।”
Albert Barnes: “जो गरीबों को दबाता है, वह न केवल मानवीय कानून से टकराता है, बल्कि परमेश्वर के मानवीय नैतिक कानून को भी ठेस पहुंचाता है।”
Adam Clarke: “धन की एकाग्रता में दुख-सुख का संतुलन खो जाता है; अन्यायपूर्ण संपत्ति-प्राप्ति एक बड़े खतरे की सीढ़ी बनती है।”
संक्षिप्त सुगमता-संदेश
जो निर्धन और कमजोरों पर अंधेर करता है, वह अपने ही समाज में असमानता और खतरे को बढ़ाकर अंत में खुद के लिए शून्यता और नुकसान लाता है। दूसरों के अधिकारों के सम्मान के बिना कोई वास्तविक धन स्थिर नहीं रहता।
लघु अनुप्रयोग